
अग्रिबाण एक्सपोज… 5 साल पहले शहर को साइलेंस सिटी बनाने का ढोल प्रशासन ने खूब पीटा, मगर पूरा प्रोजेक्ट फाइलों में हो गया दफन
इंदौर। यातायात प्रबंधन (traffic management) से लेकर शोर-शराबे पर प्रशासन (Administration) लगातार प्रतिबंधात्मक आदेश (Restrictive order) जारी तो करता है जो कागजी ही साबित होते हैं। यहां तक कि 5 साल पहले इंदौर को साइलेंट सिटी बनाने का भी ढोल जमकर पीटा गया और 39 स्पॉट चिन्हित किए गए, जहां पहले चरण में साइलेंट झोन (silence zones) घोषित किए जाना थे। इस साइलेंट सिटी का मीडिया के जरिए इतना प्रचार-प्रसार हुआ कि देश के जाने-माने उद्योगपति आनंद महिन्द्रा ने भी ट्विट कर इसकी सराहना कर डाली। मगर यह पूरा प्रोजेक्ट फाइलों में ही दफन हो गया और अभी हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई फटकार और दिए गए निर्देश के चलते अब नए सिरे से साइलेंट झोन शहर में घोषित करने की प्रक्रियाशुरू की गई। अभी पिछले दिनों 24 सितम्बर को इंदौर हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में नगरीय क्षेत्र में ये शांत क्षेत्र यानी साइलेंट जोन घोषित किए जाना है। मैरिज गार्डन होटल, बार से लेकर अन्य आयोजनों के चलते अधिकांश रहवासी क्षेत्र शोर-शराबे से परेशान हैं और कई बार कंट्रोल रूम को फोन कर रहवासियों द्वारा शिकायतें भी दर्ज कराई जाती रही है।
इन साइलेंट झोन के लिए जनता से सुझाव प्राप्त करने और ध्वनि विस्तार यंत्रों से संबंधित समस्याओं की सूचना संबंधित विभाग तक पहुंचाने के लिए हेल्पलाइन नम्बर भी निर्धारित किए जाने के निर्देश दिए गए हैं, जिसके चलते इन निर्देशों के परिपालन में संबंधित विभागों द्वारा आवश्यक कार्रवाई की जाएगी, जिसमें पुलिस, प्रशासन, यातायात, निगम से लेकर प्रदूषण नियंत्रण मंडल भी शामिल रहेगा। जनता से प्राप्त सुझावों के आधार पर भविष्य में आवश्यकतानुसार नए साइलेंट जोन घोषित किए जाएंगे। यहां तक कि प्रशासन ने साइलेंट सिटी की घोषणा के चलते डीआरपी लाइन के पास लगे ट्रैफिक सिग्नल को बदलकर नॉइट सेंसेटिव सिग्रल लगाने की घोषणा भी की थी, जिसमें हॉर्न बजने या तेज आवाज होने पर सिग्नल की बत्ती लाल यानी रेड हो जाएगी और इस पायलट प्रोजेक्ट के सफल होने पर शहर के अन्य चौराहों पर इस तरह के सिग्नल लगाने का दावा किया गया, जिस पर बेवजह कानफोड़ू और कर्कश हॉर्न बजाने की बुरी आदत से छुटकारा पाया जा सके। इतना ही नहीं, साइलेंट सिटी के लिए जो रोडमैप बनाया गया उसमें पहले चरण में 39 क्षेत्र चिन्हित किए गए, जहां पर हॉर्न-डीजे या अन्य शोर-शराबे वाले यंत्रों पर रोक लगाई जाना थी और इसके साथ जागरूकता अभियान भी चलाया जाता और शोर-शराबा करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई भी होती, ताकि शहर को नॉइस पॉल्यूशन यानी ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति दिलाई जा सके। मगर यह प्रोजेक्ट फाइलों में ही दफन हो गया और उसके बाद शोर-शराबा बढ़ता ही गया। यहां तक कि पूर्व में प्रशासन ने ऐसे सेंसेटिव और 20 साइलेंट झोन भी घोषित किए थे, जिनमें हॉस्पिटल, कोर्ट, कलेक्टर कार्यालय सहित अन्य स्थान तय थे। मगर जब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इन साइलेंट झोन की जांच की तो पता चला कि एमवाय के पास 62 फीसदी से अधिक शोर-शराबा पाया गया तो कलेक्टर कार्यालय के पास 66 फीसदी और बॉम्बे हॉस्पिटल के पास 54 फीसदी अधिक शोर पाया गया। जबकि ये साइलेंट झोन में चिन्हित किए गए। इतना ही नहीं, कोठारी मार्केट, महू नाका क्षेत्र में 20 फीसदी से अधिक, तो एलआईजी, राजवाड़ा में 50 फीसदी तक और सुदामा नगर, परदेशीपुरा में 25 फीसदी से अधिक शोर-शराबा जांच में पाया गया। इसी तरह अधिकतम ध्वनि प्रदूषण की भी महीनावार जांच की गई तो उसमें विजय नगर, प्रेम नगर, नीरंजनपुर, योजना 78 सहित अन्य क्षेत्रों में निर्धारित ध्वनि प्रदूषण 25 फीसदी से लेकर 45 फीसदी तक पाया गया। अभी हाईकोर्ट में ध्वनि प्रदूषण मामले में ही आदेश किए, जिसके चलते नए सिरे से साइलेंट झोन बनाने की कवायद प्रशासन ने शुरू करवाई। हालांकि लगातार कलेक्टर के साथ-साथ पुलिस कमिश्रर द्वारा भी ध्वनि विस्तार यंत्रों के उपयोग को लेकर प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए जाते रहे हैं, मगर मैदानी अमल नजर नहीं आता। शहर में राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक आयोजनों में डीजे से लेकर लाउड स्पीकरों और अन्य ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग होता है, जिसमें किसी भी तरह के मापदण्डों का पालन नहीं किया जाता। यहां तक कि तमाम रहवासी क्षेत्रों में भी आधी रात के बाद तक शोर-शराबा होता रहता है।
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