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अयोध्यापुरी के चर्चित सिम्प्लेक्स भू-घोटाले में शासन कोर्ट में जवाब तक प्रस्तुत नहीं कर पाया… भूखंड पीड़ितों को देखना पड़ा हार का मुंह

October 10, 2026

  • अग्रिबाण एक्सपोज… देवी अहिल्या संस्था की चार एकड़ जमीन मामले में अधूरी रजिस्ट्री, खसरा नम्बरों की पुष्टि ना होने सहित कम्पनी के पक्ष में फैसला
  • अब हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे

इंदौर, राजेश ज्वेल
देवी अहिल्या श्रमिक कामगार संस्था (Devi Ahilya Shramik Kamgar Sanstha) की कॉलोनी अयोध्यापुरी (Ayodhya-puri) में 4 एकड़ जमीन सिम्प्लेक्स (Simplex)  इन्वेस्टमेंट एंड मेगा फाइनेंस प्रा.लि. नामक कम्पनी को 17 साल पहले बेच दी थी और इस जमीन को हासिल करने के लिए भूखंड पीड़ित लगातार लड़ाई लड़ते रहे और 5 साल पहले शासन के निर्देश पर जो ऑपरेशन भूमाफिया चलाया गया उसमें तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह ने इसी जमीन के मामले में एफआईआर भी दर्ज करवाई थी और मजे की बात यह रही कि अब जिला कोर्ट से जो 65 पेज का आदेश पारित हुआ, उसी में साफ लिखा है कि अनुविभागीय अधिकारी और कलेक्टर द्वारा प्रस्तुत वाद का लिखित जवाब ही प्रस्तुत नहीं किया, जिसके चलते प्रशासन की ओर से एक पक्षीय मामला रहा और भूखंड पीड़ितों को हार का मुंह देखना पड़ा। अब इस मामले में हाईकोर्ट में अपील करने का दावा संस्था के साथ रहवासी कल्याण समिति के साथ प्रशासन ने भी किया है। इस विस्तृत आदेश को पढ़ने के बाद यह भी स्पष्ट होता है कि कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं का तथ्यात्मक जवाब भी नहीं प्रस्तुत किया गया और कोर्ट के समक्ष आए साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला सुनाना पड़ा।


  • अयोध्यापुरी कॉलोनी में ही शामिल अन्य इसी तरह अवैध रूप से बिकी जमीनों की रजिस्ट्रियां शून्य करवाने के साथ प्रशासन ने अपनी सख्ती के बलबूते पर जमीनी जादूगरों से सरेंडर भी करवाई गई, जिसमें संस्था की ही दूसरी कॉलोनी श्री महालक्ष्मी नगर भी शामिल रही। मेसर्स मिरांडा इंटरप्राइजेस के अलावा व्यक्तिगत रूप से खरीदी गई जमीनों के साथ-साथ सैटेलाइट इन्फ्रा क्रिएशन प्रा.लि. केएस सिटी सहित अन्य जमीनें भूखंड पीड़ितों के हक में प्राप्त हुई, लेकिन सिम्प्लेक्स कम्पनी ने जमीन सरेंडर नहीं की, जिसके चलते 5 साल पहले प्रशासन ने संघवी, मद्दे, खतरी सहित अन्य के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करवाई गई। 16 खसरा नम्बरों पर बसी अयोध्यापुरी की लगभग 15 एकड़ जमीन में से 4 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री 17 साल पहले तत्कालीन अध्यक्ष रघुवीरसिंह सूदन द्वारा करवाई गई और अभी 26वेें जिला न्यायाधीश की कोर्ट से 65 पेज का विस्तृत आदेश जारी हुआ, जिसमें खसरा नम्बरों, रजिस्ट्री सहित अन्य विसंगतियों की ओर ध्यान तो आकर्षित किया गया मगर प्रशासन ने जहां अपना पक्ष नहीं रखा वहीं रहवासी कल्याण समिति और संस्था की ओर से भी यह प्रमाणित नहीं किया जा सका कि कम्पनी ने त्रुटिपूर्ण तरीके से जमीन खरीदी है। मास्टर प्लान में चूंकि इस जमीन का उपयोग आवासीय नहीं होकर पीएसपी (स्वास्थ्य) है। उसका भी लाभ कम्पनी को अपनी दलीलों के जरिए मिला। बिना निगम अनुमति के मकान बना लेने के साथ विकास कार्य भी करवाने का मामला भी कोर्ट में उठाया गया। इस आदेश में यह बी कहा गया कि जब तक रजिस्ट्री को शून्य घोषित करवाए जाने की सहायता नहीं मांगी जाती तब तक ऐसे दावे का कोई औचित्य ही नहीं है। न्यायाधीश ने अपने इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई न्याय दृष्टांतों का भी हवाला दिया और कहा कि रहवासी कल्याण समिति विवादित जमीन पर अपना स्वामित्व और आधिपत्य प्रमाणित करने में असफल रही, वहीं समिति के सदस्यों को जो 178 भूखंडों को बेचा गया उसके समर्थन में भी आवश्यक विक्रय-पत्र और दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं रखे और गवाहों के बयानों में भी आवंटन और पंजीकृत विक्रय में भी अंतर सामने आया और समिति की ओर से मांगी गई राहत भी कानूनी रूप से स्वीकार किए जाने योग्य नहीं पाई गई, जिसके चलते संस्था के साथ-साथ समिति का प्रति दावा भी खारिज हो गया। कम्पनी के पक्ष में 24 फरवरी 2007 को विक्रय-पत्र का पंजीयन कराया गया था, उसे भी अवैध और शून्य घोषित करने के प्रतिदावे को कोर्ट ने स्वीकार योग्य नहीं पाया।

    दोषी अधिकारियों पर होगी कार्रवाई, अपील करेंगे : कलेक्टर
    इस आदेश के बारे में जब कलेक्टर शिवम वर्मा से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इसका विधिवत परीक्षण करवाएंगे और किस अधिकारी की लापरवाही के चलते जवाब प्रस्तुत नहीं हुआ उसकी भी जांच होगी और हाईकोर्ट में प्रशासन द्वारा भी अपील करवाई जाएगी। उल्लेखनीय है कि सिम्प्लेक्स को बेची गई संस्था की जमीन के मामले में ही 2021 में तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह द्वारा एमआईजी थाने पर एफआईआर दर्ज कराई गई थी और उसके बाद आए कलेक्टरों ने भी लगातार बैठकें लेकर भूखंड पीड़ितों को न्याय दिलवाने और अवैध रूप से बिकी जमीन को वापस दिलवाने के दावे भी किए। मगर अभी कोर्ट में प्रशासन यानी कलेक्टर की ओर से जवाब तक प्रस्तुत नहीं किया जिसके चलते एक पक्षीय मामला रहा।

    4 करोड़ में बिकी जमीन और खाते में आए सिर्फ 1.80 करोड़
    सिम्प्लेक्स को 1.619 हेक्टेयर यानी 4 एकड़ जमीन ग्राम खजरानी में बेची गई और विक्रय-पत्र में यह भी स्पष्ट नहीं है कि 16 खसरों में से किस खसरे की जमीन बेची गई। अलबत्ता बाद में नामांतरण के वक्त दो खसरे शामिल कर लिए। 4 करोड़ रुपए का उल्लेख रजिस्ट्री में किया गया और इस राशि के 20 चेक प्राप्त होना थे, जिनमें से 9 चेक की 1.80 करोड़ राशि ही प्राप्त हुई और शेष 11 चेक की राशि 2.20 करोड़ आज तक नहीं मिली। हालांकि इस मामले में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देकर रजिस्ट्री को अवैध नहीं माना। इतना ही नहीं, रजिस्ट्री में वर्णित चैक कभी प्रस्तुत भी नहीं किए और कम्पनी के खाते में भी इतना बैलेंस नहीं था कि वह रजिस्ट्री में वर्णित 4 करोड़ की राशि का भुगतान कर सके।

    अयोध्यापुरी वैध भी नहीं होने दी और लगातार अड़ंगे डालते रहे भूमाफिया
    देवी अहिल्या की कॉलोनी अयोध्यापुरी और श्री महालक्ष्मी नगर के साथ-साथ अन्य संस्थाओं के भूखंड पीड़ितों को 5 साल पहले प्रशासन ने शिविर लगाकर भूखंडों का कब्जा दिलवाया था, जिसके चलते बाउण्ड्रीवॉल बनाने के साथ-साथ कई आवंटितों ने मकान भी बना लिए। अयोध्यापुरी की जमीन का भू-उपयोग चूंकि पीएसपी है, लिहाजा उसे वैध करवाने के भी प्रयास संस्था सदस्यों ने किए। मगर भूमाफियाओं ने इसमें भी लगातार अड़ंगे डाले और हाईकोर्ट में भी चुनौती दी गई। इतना ही नहीं, जब नगर निगम ने बिना कॉलोनी को वैध किए धारा 15 के तहत प्रबंधन अपने हाथ में लेना चाहा, तब उसमें भी अड़ंगे डाले गए और संस्था पर काबिज भूमाफियाओं के पदाधिकारियों ने लिखित में आपत्ति दर्ज कराकर कॉलोनी को वैध नहीं होने दिया, जबकि वर्तमान मास्टर प्लान में शामिल कई निजी जमीनों का भू-उपयोग परिवर्तित हो गया। मगर अयोध्यापुरी का भू-उपयोग कभी भी आवासीय नहीं किया गया।

    अंतिम सुनवाई के बाद 9 बार ट्रांसफर होता रहा केस
    यह मामला इसलिए भी रोचक है कि सिम्प्लेक्स को बिकी जमीन को वापस संस्था द्वारा हासिल करने, ताकि भूखंड पीड़ितों को प्लॉट मिल सके। यह अदालती लड़ाई कई वर्षों से चलती रही और अंतिम सुनवाई होने के बाद फैसला आने से पहले 9 बार कोर्ट ही बदलवा दी गई। यहां तक कि कुछ समय पूर्व हाईकोर्ट ने 90 दिन का समय तय किया, जिसमें अंतिम और निर्णायक सुनवाई कर फैसला दिया जा सके। उसी के चलते अभी 26वें जिला न्यायाधीश द्वारा यह फैसला सुनाया गया।

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