
जबलपुर। मप्र आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के विखंडन को राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद जबलपुर शहर में एक बार फिर गहरी निराशा और प्रशासनिक उपेक्षा का माहौल बन गया है। निराशा इस बात की ज्यादा है कि जबलपुर के साथ फिर ना इंसाफी हुई और इस शहर के कारण आधार फिर से गहरी खामोशी ओढ़कर बैठे हुए हैं। कैबिनेट ने मप्र आयुर्विज्ञान संशोधन विधेयक को स्वीकृति दे दी, जिसके परिणामस्वरूप प्रदेश की एकमात्र मेडिकल यूनिवर्सिटी अब दो भागों में विभाजित होगी।
प्रशासनिक और शैक्षणिक मोर्चे पर झटका
विश्वविद्यालय के दायरे में भारी कमी आने के कारण इसके प्रशासनिक ढांचे पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार नई व्यवस्था के संचालन पर प्रत्येक वर्ष लगभग 10 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार आएगा। शिक्षा जगत के कुछ विशेषज्ञों का यह स्पष्ट कहना है कि संस्थागत आकार घटने से विश्वविद्यालय की निर्णय लेने की क्षमता, शैक्षणिक प्रभाव और दीर्घकालिक पहचान गंभीर रूप से प्रभावित होगी। वर्तमान में विश्वविद्यालय से 80 से अधिक कॉलेज संबद्ध हैं, जिनमें 16000 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। नए विभाजन के बाद जबलपुर विश्वविद्यालय के पास केवल 10 कॉलेज ही रह जाएंगे, जिससे शहर का शैक्षणिक गौरव और रुतबा दोनों ही कमजोर होंगे।
अधिकारों पर चली साजिश की कैंची
मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय को लेकर लिए गए इस फैसले ने जबलपुर से जुड़े पुराने और संवेदनशील सवालों को फिर से चर्चा में ला दिया है। शहर के विभिन्न सामाजिक और व्यापारिक संगठनों का लंबे समय से यह गंभीर आरोप रहा है कि पिछले 2 दशकों में राज्य के कई महत्वपूर्ण संस्थानों के मुख्यालय तथा प्रमुख प्रशासनिक अधिकार जबलपुर से अन्य शहरों में स्थानांतरित किए गए हैं। इनमें राज्य विद्युत मंडल, आबकारी आयुक्त कार्यालय, भूविज्ञान एवं खनन संचालनालय, बीमा संचालनालय तथा अन्य विभागों के नाम प्रमुख रूप से गिनाए जाते हैं। अब इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का विभाजन भी स्थानीय स्तर पर एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष का विषय बन गया है। शहर के कई नागरिक संगठन इसे जबलपुर की संस्थागत भूमिका में लगातार आ रही गिरावट की एक और बड़ी कड़ी मान रहे हैं। राजनीतिक हलकों में भी अब यह तीखा सवाल उठने लगा है कि क्या शहर का नेतृत्व प्रमुख संस्थानों को संरक्षित रखने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। अगर यही स्थिति इंदौर या भोपाल जैसे शहरों में आई होती, तो अब तक जोरदार विरोध प्रदर्शन हो चुके होते और शायद ऐसी नौबत ही नहीं आती। जबलपुर के हक और अधिकारों की लड़ाई लडऩे के लिए आज कोई भी मजबूत राजनीतिक चेहरा आगे नहीं आ रहा है, जिसके कारण शहर की लगातार हो रही उपेक्षा आम नागरिकों के लिए गहरी चिंता का विषय बन गई है।
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