
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने की। पीठ ने चेतन सभरवाल और नितिन सभरवाल की ओर से दाखिल अपील को खारिज करते हुए कहा कि आयकर विभाग के पास दोबारा जांच शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद थे। अदालत के अनुसार 31 मार्च 2015 को आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत जारी किया गया नोटिस ठोस तथ्यों और आयकर विभाग की जांच इकाई की रिपोर्ट पर आधारित था। इस रिपोर्ट में वित्तीय लेन-देन से जुड़े ऐसे तथ्य सामने आए थे जिनकी आगे जांच किया जाना जरूरी था। अदालत ने माना कि विभाग की कार्रवाई को केवल इस आधार पर गलत नहीं ठहराया जा सकता कि संबंधित लेन-देन कई साल पुराने हैं।
इस पूरे मामले की शुरुआत दो कंपनियों पवन इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड और एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के शेयरों की बिक्री से हुई थी। जांच में सामने आया कि इन कंपनियों के शेयरों का मूल्य उनकी जमीन और इमारतों की वास्तविक लागत की तुलना में काफी अधिक दिखाया गया था। आरोपों के मुताबिक चेतन सभरवाल और उनके भाई नितिन सभरवाल ने दो अन्य शेयरधारकों के साथ मिलकर जीवाईएस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के साथ शेयर बिक्री का समझौता किया था। इस समझौते के तहत पवन इम्पेक्स के 7.5 लाख शेयर 195 करोड़ रुपये में बेचे गए थे। वहीं एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर के 2.5 लाख शेयरों की बिक्री 60 करोड़ रुपये में हुई थी। इस तरह दोनों कंपनियों के शेयरों का कुल सौदा 255 करोड़ रुपये का बताया गया। समझौते के अनुसार कुल बिक्री राशि में चारों शेयरधारकों को बराबर हिस्सा मिलना था। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में शेयरों के मूल्यांकन और प्राप्त रकम को लेकर सवाल उठे थे।
आयकर विभाग की जांच इकाई ने दोनों कंपनियों के शेयरों की कीमत और उनसे जुड़े वित्तीय लेन-देन की पड़ताल की। जांच के दौरान अप्रैल 2010 में दिल्ली के सिकंदरा रोड स्थित एक संपत्ति की खरीद का मामला भी सामने आया। बताया गया कि सभरवाल भाइयों ने अदालत की नीलामी के माध्यम से इस संपत्ति में आधा हिस्सा खरीदा था। जांच में कथित तौर पर यह बात सामने आई कि संपत्ति में निवेश के लिए कंपनियों के शेयरों की बिक्री से प्राप्त रकम का इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद आयकर विभाग ने इस निवेश और शेयर बिक्री के बीच संबंधों की जांच शुरू की।
जांच रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने निर्धारित चार साल की समयसीमा बीतने के बाद आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत दोबारा आकलन का नोटिस जारी किया था। सभरवाल भाइयों ने इस कार्रवाई को चुनौती दी थी लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के नोटिस को सही माना था। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद आयकर विभाग के लिए पुराने वित्तीय लेन-देन की जांच का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि अदालत के इस फैसले का अर्थ किसी को दोषी ठहराना नहीं है बल्कि इसका मतलब है कि विभाग को कानून के तहत दोबारा जांच करने का अधिकार है।
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