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चिकनगुनिया के इलाज की दिशा में नई उम्मीद, IIT रुड़की की रिसर्च में गौमूत्र आधारित यौगिकों ने दिखाया मजबूत एंटीवायरल प्रभाव

June 25, 2026

नई दिल्ली । मच्छरों से फैलने वाली वायरल बीमारियों (Viral Diseases) के खिलाफ प्रभावी उपचार की तलाश के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (Indian Institute Of Technology Roorkee) के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण शोध परिणाम प्रस्तुत किया है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने गौमूत्र डिस्टिलेट (Cow Urine Distillate) में ऐसे जैव-सक्रिय यौगिकों की पहचान की है, जिन्होंने प्रयोगशाला स्तर पर चिकनगुनिया वायरस (Chikungunya Virus) के खिलाफ उल्लेखनीय एंटीवायरल प्रभाव (Antiviral Effect) दिखाया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में नई दवाओं के विकास के लिए आधार तैयार कर सकती है, हालांकि इसे अभी सीधे उपचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

यह अध्ययन आईआईटी रुड़की के बायोसाइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। शोध में विभिन्न आयुर्वेदिक और बायोमेडिकल संस्थानों का भी सहयोग लिया गया। अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने चिकनगुनिया वायरस से संक्रमित कोशिकाओं पर गौमूत्र डिस्टिलेट के प्रभाव का परीक्षण किया। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में पाया गया कि सीमित मात्रा में उपयोग किए जाने पर यह वायरस की सक्रियता को काफी हद तक कम करने में सक्षम रहा।

शोधकर्ताओं के अनुसार, परीक्षण के दौरान संक्रमित कोशिकाओं में गौमूत्र डिस्टिलेट मिलाने पर वायरस की मात्रा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। अध्ययन में यह भी पाया गया कि सांद्रता बढ़ाने पर वायरस की सक्रियता और अधिक घट गई। हालांकि यह परिणाम केवल नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में प्राप्त हुए हैं और इन्हें मानव उपचार से जोड़ने के लिए अभी कई चरणों के वैज्ञानिक परीक्षण शेष हैं।

रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने गौमूत्र डिस्टिलेट में कई महत्वपूर्ण जैव-सक्रिय यौगिकों की पहचान की। इनमें बेंजोइक एसिड, हिप्यूरिक एसिड और ओलेइक एसिड जैसे तत्व शामिल हैं। अध्ययन में संकेत मिला कि ये यौगिक वायरस के जीवन चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रोटीन और एंजाइमों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप वायरस की प्रतिकृति बनाने और शरीर में फैलने की क्षमता कमजोर हो सकती है।

अध्ययन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि जब गौमूत्र डिस्टिलेट को कुछ प्राकृतिक यौगिकों के साथ मिलाकर परीक्षण किया गया तो वायरस के खिलाफ और अधिक प्रभावशाली परिणाम देखने को मिले। वैज्ञानिकों का मानना है कि विभिन्न प्राकृतिक यौगिकों का संयोजन भविष्य में नई एंटीवायरल दवाओं के विकास का आधार बन सकता है।

हालांकि विशेषज्ञों ने इस शोध को लेकर सावधानी बरतने की सलाह भी दी है। उनका कहना है कि प्रयोगशाला में प्राप्त परिणाम और मानव शरीर में वास्तविक प्रभाव के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। किसी भी संभावित दवा को उपयोग के लिए स्वीकृति मिलने से पहले प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षणों के कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इसलिए इस अध्ययन के आधार पर सीधे गौमूत्र का सेवन या घरेलू उपचार अपनाना उचित नहीं माना जा सकता।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी के समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत करता है। यदि आगे के परीक्षणों में भी सकारात्मक परिणाम मिलते हैं तो इससे चिकनगुनिया सहित अन्य मच्छरजनित वायरल रोगों के उपचार के लिए नए विकल्प विकसित किए जा सकते हैं।


  • भारत में हर वर्ष मानसून और उसके बाद के महीनों में चिकनगुनिया के मामले सामने आते हैं। ऐसे में इस तरह के अनुसंधान सस्ती और सुलभ दवाओं की खोज की दिशा में उपयोगी साबित हो सकते हैं। फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय इस शोध को एक प्रारंभिक लेकिन उत्साहजनक उपलब्धि के रूप में देख रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतिम निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए विस्तृत क्लिनिकल अध्ययन और दीर्घकालिक परीक्षणों की आवश्यकता बनी हुई है।

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