
भोपाल। मध्यप्रदेश में सरकारी कर्मचारियों से जुड़े वर्षों से लंबित मामलों को अब सिर्फ आंकड़ों में दर्ज करके छोडऩा आसान नहीं होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जल्द ही कर्मचारी कल्याण से जुड़े पांच बड़े विषयों की समीक्षा करने जा रहे हैं। इस समीक्षा की खास बात यह होगी कि विभागों को केवल लंबित मामलों की संख्या नहीं बतानी होगी, बल्कि हर बड़ी पेंडेंसी के पीछे की वजह और उसे खत्म करने का रास्ता भी बताना होगा। मुख्यमंत्री सचिवालय ने अनुकंपा नियुक्ति, पदोन्नति, सीधी भर्ती, विभागीय जांच और पेंशन से जुड़े मामलों की विभाग, संभाग और जिला स्तर तक जानकारी जुटाना शुरू कर दिया है। सामान्य प्रशासन विभाग को सभी विभागों से आंकड़े जुटाकर मुख्यमंत्री के सामने प्रस्तुतीकरण तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है।
प्रमोशन के बाद खाली पदों से भर्ती का रास्ता
सीधी भर्ती को भी इस समीक्षा से जोड़ा गया है। विभागों को पहले से खाली पदों के साथ-साथ हाल में हुई पदोन्नतियों से खाली हुए पदों की जानकारी देनी होगी। मुख्यमंत्री पहले ही 85 हजार पदों पर भर्ती प्रक्रिया चलने और पदोन्नति के बाद खाली होने वाले करीब एक लाख पदों को सीधी भर्ती से भरने की बात कह चुके हैं। ऐसे में इस समीक्षा में विभागवार रिक्तियों का वास्तविक आंकड़ा महत्वपूर्ण होगा। इससे सरकार को यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस विभाग में कितने पद खाली हैं और भर्ती की जरूरत कहां सबसे ज्यादा है।
प्रमोशन रुका तो संवर्गवार बतानी होगी वजह
सरकारी विभागों में पदोन्नति की प्रक्रिया लंबे समय तक अटकने का असर कर्मचारियों की सेवा अवधि और पद दोनों पर पड़ता है। अब सरकार विभाग, संभाग और जिले के साथ-साथ संवर्गवार लंबित पदोन्नति मामलों की जानकारी लेगी। लंबे समय से लंबित मामलों के कारण, पदोन्नति में नीतिगत अड़चन और प्रक्रिया को समयसीमा में पूरा करने के सुझाव मुख्यमंत्री के सामने रखे जाएंगे। यानी समीक्षा का फोकस केवल यह जानना नहीं होगा कि कितने प्रमोशन रुके हैं, बल्कि यह भी होगा कि रुकावट किस स्तर पर है।
विभागीय जांच भी अब ‘लंबित’ कहकर नहीं चलेगी
सरकारी : कर्मचारियों के खिलाफ चल रही विभागीय जांच की पेंडेंसी भी समीक्षा में शामिल होगी। कितने मामले लंबित हैं, कितने लंबे समय से अटके हैं और निर्धारित समयसीमा के बाद भी जांच पूरी क्यों नहीं हुई-इन सभी सवालों का जवाब देना होगा। खास तौर पर लंबे समय से लंबित मामलों की अलग से जानकारी मांगी गई है। अधिकारियों को यह भी बताना होगा कि जांच जल्द पूरी करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं। इससे विभागीय जांच में देरी के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक स्तर की पहचान का रास्ता खुल सकता है।
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