नई दिल्ली। देश में जब भी अनशन और अहिंसक आंदोलन की बात होती है तो सबसे पहले महात्मा गांधी का नाम सामने आता है। सत्याग्रह (Satyagraha) को जनआंदोलन (mass movement) का स्वरूप देने वाले गांधीजी ने अपने सार्वजनिक जीवन में 30 से अधिक बार उपवास और अनशन का सहारा लिया। इनमें सबसे चर्चित और सबसे लंबा अनशन 21 दिनों का था, जिसे उन्होंने 1943 में आगा खान पैलेस में नजरबंदी के दौरान किया था। उस समय उनकी उम्र 73 वर्ष थी और स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था। ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि वे जीवित नहीं बचेंगे, इसलिए उनके अंतिम संस्कार तक की तैयारियां कर ली गई थीं।
संसद मार्च के बीच सीजेपी नेताओं और केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा की मुलाकात के बाद अभिजीत दीपके और तीन छात्रों ने अपना अनशन समाप्त कर दिया, लेकिन सोनम वांगचुक का अनशन अब भी जारी है। ऐसे में देश के इतिहास में अनशन की परंपरा और महात्मा गांधी के आंदोलनों की चर्चा फिर तेज हो गई है।
महात्मा गांधी ने फरवरी 1943 में आगा खान पैलेस में 21 दिन का उपवास शुरू किया था। उस समय वे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के बाद अंग्रेजों की नजरबंदी में थे। ब्रिटिश सरकार उन पर आंदोलन के दौरान हुई हिंसा का नैतिक दायित्व डाल रही थी, जबकि गांधीजी इस आरोप को स्वीकार नहीं करते थे। इसी विरोध में उन्होंने उपवास का रास्ता चुना।
गांधीजी की बढ़ती उम्र और कमजोर स्वास्थ्य को देखते हुए डॉक्टरों ने उनकी स्थिति को बेहद गंभीर बताया था। उपवास के कुछ ही दिनों बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी, जिससे ब्रिटिश प्रशासन की चिंता और बढ़ गई।
गांधीजी की हालत लगातार खराब होने पर ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि यदि उपवास के दौरान उनका निधन हो गया तो पूरे देश में व्यापक जनाक्रोश फैल सकता है। विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार प्रशासन ने संभावित स्थिति से निपटने की तैयारी शुरू कर दी थी। मीराबेन ने अपनी पुस्तक ‘एक साधिका की जीवनयात्रा’ में उल्लेख किया है कि गांधीजी के अंतिम संस्कार के लिए चंदन की लकड़ियां तक मंगवा ली गई थीं और अधिकारियों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए थे।
हालांकि तमाम आशंकाओं के बीच गांधीजी ने 21 दिन का उपवास पूरा किया और बाद में उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे सुधरा।
महात्मा गांधी ने अपने सार्वजनिक जीवन में अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अनेक बार अनशन किया। छुआछूत के खिलाफ अभियान, सांप्रदायिक सौहार्द, सामाजिक सुधार और अहिंसा के संदेश को मजबूत करने के लिए उन्होंने उपवास को नैतिक दबाव के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया।
भारत के इतिहास में कई अन्य लंबे अनशन भी दर्ज हैं।
अनशन भारतीय लोकतांत्रिक आंदोलनों का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। महात्मा गांधी ने इसे नैतिक प्रतिरोध और अहिंसक संघर्ष का प्रतीक बनाया, जिसका प्रभाव आज भी विभिन्न जन आंदोलनों में देखने को मिलता है।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved