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रईसी की मौत से ईरान के सुप्रीम लीडर के उत्तराधिकारी की रेस हुई दिलचस्प, रईसी के काल में भारत से रिश्ते


तेहरान: ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी (iranian president ibrahim raisi) की मौत के बाद भारत (india) समेत पूरी दुनिया (world) की नजर ईरान (iran) पर है। रईसी ऐसे समय में हादसे का शिकार हुए जब पश्चिम एशिया अस्थिरता से जूझ रहा है। यहां ईरान की भूमिका पर खास ध्यान दिया जा रहा था। ऐसी स्थिति में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई (ayatollah ali khamenei) को रईसी के अचानक निधन से खाली हुई जगह को भरने के लिए कदम उठाना होगा। 2021 में राष्ट्रपति बने 63 वर्षीय रईसी ईरान के कट्टरपंथी नेताओं में रहे हैं, जिन्हें सुप्रीम लीडर खामेनेई के उत्तराधिकारी के रूप में भी देखा जा रहा था। वह रूढ़िवादी के प्रभुत्व वाले ईरानी प्रतिष्ठान में फिट बैठते थे। लेकिन अब उनके निधन के बाद सभी की निगाहें फिर से वयोवृद्ध खामेनेई पर होंगी और शीर्ष दावेदारों में सुप्रीम लीडर के बेटे मोजतबा खामेनेई होंगे।



मोजतबा का दावा मजबूत
मोजतबा ने अभी तक खुद को लो प्रोफाइल बनाए रखा है। हालांकि, उनके पास प्रशासनिक अनुभव की कमी है लेकिन रईसी के जाने के बाद उनके चर्चा में आने की उम्मीद है। हाल के महीनों ईरान पर दुनिया का ध्यान 7 अक्टूबर के बाद हुई घटनाओं के चलते रहा है। 7 अक्टूबर को इजरायल पर हमास ने बेहद ही क्रूर हमला किया था। इस हमले में ईरान का समर्थन माना गया था। ईरान यहूदी देश के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है और उसने इजरायल के खात्मे की कसम खाई है। इसके बाद इजरायल ने 7 महीने से ज्यादा समय से गाजा में अभियान चला रखा है, जिसमें 35 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।

रईसी ईरान के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और लंबे समय तक शीर्ष अभियोजक रहे थे। ईरान में 1988 के दौरान राजनीतिक कैदियों की सामूहिक हत्या में भूमिका के लिए रईसी की आलोचना होती रही है। उन्हें अमेरिकी प्रतिबंधों का भी सामना करना पड़ा था। 2021 में रईसी के सत्ता में आने के बाद से ईरान ने अधिक कट्टरपंथी रुख अपनाया है। पिछले कुछ वर्षों में तेहरान ने कम से कम पांच संकेत दिए जिसमें उसकी ताकत को हासिल करने की ललक साफ दिखी थी।

रईसी के कार्यकाल में कट्टरपंथ की ओर ईऱान
1- ईरान ने सबसे पहले अपने परमाणु कार्यक्रम को दोगुना कर दिया, जिससे पश्चिमी देश नाराज हुए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु कार्यक्रम पर समझौते से बाहर निकलने की घोषणा कर दी। ईरान के आक्रामक रुख को उसके कट्टरपंथी प्रतिष्ठान ने सही ठहराया था। कहा गया कि अमेरिका के कदम पीछे खींच लेने के बाद वाशिंगटन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

2- दूसरी बार ईरान ने पश्चिम विरोधी रुख एक बार फिर खुलकर जाहिर किया जब रूस ने फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमला किया। पश्चिम के विरोध के बावजूद ईरान ने रूस का समर्थन करने का फैसला किया। ईरानी नेतृत्व ने नाटो के विस्तार की ईरान के लिए भी खतरे के रूप में व्याख्या की।

3- ईरानी प्रतिष्ठान ने तीसरी बार अपनी ताकत का प्रदर्शन 2022 के उत्तरार्ध में किया जब ईरान में हिजाब के खिलाफ युवतियों ने ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। उसी साल सितम्बर में महसा अमीनी की ईरान की मोरल पुलिस के उत्पीड़न के बाद हुई मौत ने देश भर में युवतियों को गुस्से में भर दिया था। ईरान में युवतियों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। इसे 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से युवतियों के नेतृत्व में पहला बड़ा प्रदर्शन बताया गया लेकिन रईसी के शासन ने क्रूर दमन के साथ उसका जवाब दिया।

4- पिछले महीने ही सीरिया में अपने वाणिज्य दूतावास पर इजरायली हमले में एक शीर्ष ईरानी जनरल की मौत के बाद ईरान ने इजरायल पर सीधा हमला बोला। ईरान ने सैकड़ों किलर ड्रोन और मिसाइलों की इजरायल के ऊपर बौछार कर दी। हालांकि, इजरायल अपने एयर डिफेंस सिस्टम, अमेरिका और दूसरे सहयोगियों की मदद से इसे नाकाम कर दिया। लेकिन ये पहली बार था जब ईरान ने इजरायल पर सीधा हमला किया और ये साबित किया कि उसकी मिसाइलें यरूशलम तक पहुंच सकती हैं।

5- प्रतिरोध की धुरी कहे जाने वाले चरमपंथी संगठनों हिजबुल्लाह, हूती और हमास को सक्रिय समर्थन देकर इसने क्षेत्र की शांति और स्थिरता को प्रभावित किया। ईरान समर्थित चरमपंथी संगठन हिजबुल्लाह लेबनान में सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत भी बन चुका है। गाजा में युद्ध शुरू होने के बाद से ही इसने उत्तरी सीमा पर इजरायल को व्यस्त कर रखा है। वहीं, यमन में मौजूद हूती चरमपंथी लाल सागर से गुजरने वालों जहाजों पर हमला करके क्षेत्र के सबसे व्यस्ति अंतरराष्ट्रीय समुद्री जलमार्ग में बाधा डाल रहे हैं, जिसका असर दुनिया भर में पड़ रहा है। वहीं, 7 अक्टूबर को हमास के हमले के बाद इजरायल और सऊदी अरब की रिश्ते सामान्य करने की पहल पटरी से उतर गई थी।

रईसी के काल में भारत से रिश्ते
ये सारे उदाहरण बताते हैं कि किस तरह से तेहरान के मुखिया के तौर पर रईसी की भूमिका पर पूरे क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर थी। भारत अपने हितों की रक्षा के लिए रईसी और उनके शासन के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा था। अगस्त 2023 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र ने जोहान्सबर्ग में रईसी से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं के बीच अच्छे संबंधों के प्रयास से ही भारत ने हाल ही में चाबहार को लेकर एक बड़ी डील पर तेहरान के साथ हस्ताक्षर किए, जिसके बाद ओमान की खाड़ी में मौजूद इस बंदरगाह का संचालन 10 सालों के लिए हासिल हुआ।
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विदेश मंत्री एस जयंशकर ने बैठकों और फोन कॉल के माध्यम से अपने ईरानी समकक्ष अमीर अब्दुल्लाहियान के साथ संपर्क बनाए रखा था। यह उस समय नजर आया, जब ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में इजरायल से जुड़े होने के आरोप में एक जहाज को कब्जे में ले लिया। इस जहाज के क्रू में 17 भारतीय थे, लेकिन भारत से बातचीत के बाद ईरान ने इन्हें छोड़ने का फैसला किया था। भारत और ईरान के बीच संबंध हजार साल से चले आ रहे हैं। दोनों देशों के बीच समकालीन संबंधों की पहचान उच्च स्तरीय आदान-प्रदान, वाणिज्यिक सहयोग, कनेक्टिविटी प्रतिमान और सांस्कृतिक और लोगों के बीच संबंधों से होती है। दोनों देशों ने 15 मार्च 1950 को मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए थे। विभिन्न सरकारों के दौरान ये संबंध लगातार मजबूत होते गए। अब रईसी के जाने के बाद भारत की नजर अगले राष्ट्रपति के साथ ही खामेनेई के संभावित उत्तराधिकारी पर भी होगी।

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