
नई दिल्ली। केंद्र सरकार (Central government) देश में नए परिसीमन (Delimitation) के तहत लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 824 से 850 करने की तैयारी में है। इसके लिए संसद में एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक (Constitution Amendment Bill) लाने की भी तैयारी कर रही है, जिसके लिए सत्ता पक्ष को लोकसभा (Lok Sabha) में बिल पर वोटिंग में शामिल होने वाले सांसदों की संख्या में से दो तिहाई के समर्थन की आवश्यक्ता होगी। इन तमाम अटकलबाजियों के बीच केरल से आने वाले कांग्रेस सांसद शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने गंभीर चिंता जताई है।
उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखकर कहा है कि यह नई व्यवस्था भारत के लोकतंत्र को खोखला कर देगी। थरूर ने चेतावनी दी है कि संसद का अत्यधिक विस्तार भारत के संस्थागत ढांचे के लिए एक विनाशकारी मोड़ साबित हो सकता है। थरूर का मानना है कि सरकार का तर्क है कि 1972 के बाद से भारत की आबादी दोगुनी से अधिक हो चुकी है, इसलिए सीटें बढ़ाना केवल एक गणितीय आवश्यकता है। यह ऊपरी तौर पर भले ही लोकतांत्रिक लगता है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक संकट छुपा हुआ है।
विशाल और बोझिल विधायिका
थरूर ने लिखा है कि दुनिया का कोई भी स्थापित लोकतंत्र अपनी विधायिका को इतना विशाल नहीं बनाता जहां सार्थक चर्चा ही असंभव हो जाए। किसी भी परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्था में सांसदों की संख्या सीमित रखी जाती है ताकि वे कानूनों की सही समीक्षा कर सकें। 850 सदस्यों वाली लोकसभा एक बहस करने वाली सभा के बजाय एक ऐसा अराजक कॉलेजियम बन जाएगी, जहां कुछ ही लोग बोलेंगे और बाकी सदस्य केवल वोटिंग मशीन के बटन दबाने वाले दर्शक बनकर रह जाएंगे।
अमेरिका में जनसंख्या बढ़ी, लेकिन संसद नहीं
उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा का उदाहरण देते हुए बताया कि 1929 में जब अमेरिका की आबादी 12 करोड़ थी, तब सीटों की संख्या 435 पर तय की गई थी। आज आबादी तीन गुनी बढ़कर 33.5 करोड़ से अधिक हो चुकी है, फिर भी सीटों की संख्या 435 ही है। अमेरिका ने समझा कि सांसद बढ़ाने से कानून बनाने की प्रक्रिया ठप हो जाएगी। इसके बजाय वहां सांसदों को बेहतर स्थानीय स्टाफ, आधुनिक संचार और मजबूत समिति प्रणाली दी गई।
सांसदों की आवाज दब जाएगी
एक 850 सदस्यों वाले सदन में 5 साल के कार्यकाल के दौरान ज्यादातर सांसद, खासकर बैकबेंचर और छोटी पार्टियों के प्रतिनिधि न तो कोई सवाल पूछ पाएंगे और न ही बहस में हिस्सा ले पाएंगे। चार घंटे की किसी बहस में मुश्किल से 15-20 सांसदों को बोलने का मौका मिलेगा। थरूर का कहना है कि यह स्थिति उस सरकार के मुफीद बैठती है जो संसद की जवाबदेही के बजाय केवल उसकी सहमति चाहती है। जब संसद बहुत बड़ी हो जाती है तो नियंत्रण स्वतः ही कैबिनेट और सरकार के हाथ में चला जाता है।
दिखावटी लोकतंत्र बनने का खतरा
थरूर ने बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि 850 सीटों वाली लोकसभा चीन की पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कांफ्रेंस या उत्तर कोरिया की सुप्रीम पीपुल्स असेंबली का एक देशी संस्करण बनकर रह जाएगी। ये विशाल संस्थाएं केवल नाम की प्रतिनिधि संस्थाएं होती हैं, जहां असली काम बहस करना नहीं बल्कि महान नेता के भाषणों पर तालियां बजाकर सहमति का दिखावा करना होता है।
उत्तर और दक्षिण भारत के बीच के अंतर को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा कि परिसीमन का यह ढांचा दक्षिण भारतीय राज्यों को उनकी सफल जनसंख्या नियंत्रण नीतियों के लिए दंडित करेगा, जबकि आबादी बढ़ाने में विफल रहे उत्तरी हिंदी भाषी राज्यों को ज्यादा सीटें देकर पुरस्कृत करेगा।
विधायक बढ़ाएं, सांसद नहीं
शशि थरूर ने सांसद और विधायक के कर्तव्यों के बीच स्पष्ट अंतर को समझने पर जोर दिया। उनके मुताबिक, संसद में सांसद का काम राष्ट्रीय कानून बनाना, विदेश नीति, व्यापक आर्थिक नीतियां और केंद्र सरकार से सवाल पूछना है। वे नगर पार्षद नहीं हैं। जबकि जनता की स्थानीय समस्याओं जैसे कि सड़क, पानी, नागरिक सुविधाएं के लिए 73वें और 74वें संविधान संशोधन के तहत राज्यों और नगर निगमों को मजबूत किया जाना चाहिए। अगर आबादी बढ़ रही है तो विधायकों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, न कि सांसदों की।
फिजूलखर्च रोकने की सलाह
उन्होंने सुझाव दिया कि 300 अतिरिक्त सांसदों के वेतन, भत्ते, आवास और पेंशन पर होने वाले भारी खर्च को बचाकर वर्तमान 543 सांसदों के लिए संसद के पास एक आधुनिक, गंभीर रिसर्च और प्रशासनिक कार्यालय बनाना ज्यादा बुद्धिमानी होगी।
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