न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के लिए हुए ताजा चुनाव में जर्मनी को बड़ा झटका लगा है। अस्थायी सदस्यता (Temporary Membership) हासिल करने की कोशिश में उतरे जर्मनी को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका, जिससे अगले दो वर्षों के लिए सुरक्षा परिषद (UN) में जगह बनाने का उसका सपना टूट गया। इस नतीजे ने न केवल यूरोपीय राजनीति बल्कि भारत समेत G-4 देशों की रणनीति पर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए मतदान में जर्मनी को आवश्यक दो-तिहाई समर्थन नहीं मिल पाया। ‘पश्चिमी यूरोप और अन्य समूह’ (WEOG) की दो सीटों के लिए हुए मुकाबले में ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल ने बाजी मार ली। पुर्तगाल को 134 वोट और ऑस्ट्रिया को 131 वोट मिले, जबकि जर्मनी 104 मतों पर सिमट गया।
जर्मनी की हार भारत के लिए क्यों मायने रखती है?
जर्मनी की यह हार भारत के लिए भी अहम संकेत मानी जा रही है। जर्मनी, भारत, जापान और ब्राजील के साथ G-4 समूह का सदस्य है, जो लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग कर रहा है।
G-4 देशों का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक शक्ति संतुलन को देखते हुए सुरक्षा परिषद में सुधार जरूरी है और विकासशील व उभरती अर्थव्यवस्थाओं को स्थायी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। ऐसे में जर्मनी जैसे प्रभावशाली देश का अस्थायी सीट तक न पहुंच पाना इस अभियान के लिए चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि संयुक्त राष्ट्र महासभा में जर्मनी को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला, तो स्थायी सदस्यता के व्यापक प्रस्ताव को लेकर भी राजनीतिक सहमति बनाना आसान नहीं होगा। इससे भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति और समर्थन जुटाने के प्रयासों पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।
क्या रूस ने बिगाड़ा खेल?
जर्मन मीडिया की रिपोर्टों में दावा किया गया है कि रूस ने जर्मनी की उम्मीदवारी के खिलाफ पर्दे के पीछे सक्रिय लॉबिंग की। इसकी एक बड़ी वजह यूक्रेन युद्ध को लेकर जर्मनी का रुख माना जा रहा है।
जर्मनी लगातार यूक्रेन के समर्थन में खड़ा रहा है, जबकि रूस इस मुद्दे पर पश्चिमी देशों की आलोचना करता रहा है। जर्मन विदेश मंत्री जोहान वेडेफुल ने भी चुनाव परिणाम के बाद संकेत दिए कि कुछ ताकतें सुरक्षा परिषद में ऐसी आवाजों को नहीं देखना चाहतीं, जो रूस की नीतियों का विरोध करती हैं।
उन्होंने कहा कि यूक्रेन के लिए जर्मनी का समर्थन मजबूत है और यह किसी से छिपा नहीं है कि रूस सुरक्षा परिषद में अपने विरोधी स्वर कम रखना चाहता है।
UNSC का गणित क्यों कठिन है?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार लंबे समय से वैश्विक बहस का विषय रहा है। फिलहाल परिषद में पांच स्थायी सदस्य-अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस-वीटो शक्ति रखते हैं। किसी नए स्थायी सदस्य को शामिल करने के लिए व्यापक वैश्विक सहमति के साथ मौजूदा स्थायी सदस्यों की सहमति भी जरूरी होती है।
ऐसे में जर्मनी की चुनावी हार ने यह संकेत दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आर्थिक ताकत ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि भू-राजनीतिक समीकरण और कूटनीतिक समर्थन भी उतने ही निर्णायक होते हैं।
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