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श्री गुरु ग्रंथ साहिब प्रकाश उत्सव : वाणी का प्रकाश, मानवता का मार्ग

September 12, 2026

– कैलाश चन्द्र

भारत की धरती केवल पर्वतों, नदियों और नगरों की धरती नहीं है। यह ऋषियों, मुनियों, संतों और तपस्वियों की साधना से पवित्र हुई भूमि है। यहाँ जब-जब समाज के सामने अंधकार आया, तब-तब किसी न किसी संत-महापुरुष ने अपने तप, त्याग और वाणी से मनुष्य को प्रकाश का मार्ग दिखाया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब इसी महान भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक अनुपम प्रकाश-स्तंभ है।

12 सितम्बर 1604 को आदि ग्रंथ का हरिमंदिर साहिब में प्रथम प्रकाश हुआ। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ के प्रतिष्ठित होने की घटना नहीं थी। यह उस वाणी के सार्वजनिक प्रकाश का क्षण था, जो मनुष्य को सत्य, संतोष, प्रेम, सेवा, करुणा और परमात्मा की ओर ले जाती है। गुरु ग्रंथ साहिब को समझने के लिए केवल उसके इतिहास को जानना पर्याप्त नहीं है। उसके लिए उसके भीतर धड़कते हुए उस भाव को समझना आवश्यक है, जो कहता है- मनुष्य अलग-अलग हो सकता है, लेकिन परमात्मा एक है और मानवता का दुःख सबका दुःख है।

गुरु अर्जुन देव जी का महान समन्वय

गुरु अर्जुन देव जी ने विभिन्न गुरुओं, संतों और भक्तों की वाणी को एकत्रित कर आदि ग्रंथ का संपादन किया। इस कार्य की महानता केवल उसके आकार में नहीं, बल्कि उसकी दृष्टि में है। इसमें विभिन्न सामाजिक और भौगोलिक पृष्ठभूमियों से आए संतों की वाणी को स्थान मिला। महाराष्ट्र के संत नामदेव, राजस्थान के संत धन्ना, गुजरात के संत त्रिलोचन, बंगाल के जयदेव और अनेक संत-भक्तों की वाणी एक ही आध्यात्मिक धारा में दिखाई देती है।

  • यह भारत की उस अंतःचेतना का परिचय है जिसमें सत्य को किसी एक जाति, क्षेत्र या वर्ग की सीमा में नहीं बाँधा गया। गुरु अर्जुन देव जी ने मानो यह कह दिया कि ईश्वर की खोज का अधिकार प्रत्येक मनुष्य को है और सत्य की अनुभूति किसी एक समूह की बपौती नहीं हो सकती। यही कारण है कि गुरु ग्रंथ साहिब भारतीय आध्यात्मिक समन्वय की एक अद्भुत मिसाल बन गया।

    प्रथम प्रकाश : श्रद्धा का वह ऐतिहासिक क्षण

    जब आदि ग्रंथ को हरिमंदिर साहिब में प्रतिष्ठित किया गया, तब बाबा बुद्धा जी ने उसे अपने सिर पर धारण किया। श्रद्धालु उसके पीछे श्रद्धा से चलते हुए आए। ग्रंथ साहिब को सम्मानपूर्वक आसन पर स्थापित किया गया। उस क्षण की कल्पना कीजिए- चारों ओर श्रद्धा, विनम्रता और भक्ति का वातावरण और सामने वह वाणी, जिसमें मनुष्य को अपने भीतर झाँकने का आह्वान था। गुरु अर्जुन देव जी ने बाबा बुद्धा जी को हुक्मनामा लेने के लिए कहा। जो प्रथम शब्द प्रकट हुआ, उसमें परमात्मा के कार्य और संतों के कल्याण की भावना थी-

    “संता के कारजि आपि खलोइआ,
    हरि कंमु करावणि आइआ राम।”

    यह केवल एक आरंभ नहीं था। यह एक ऐसी परंपरा का प्रकाश था, जिसमें ग्रंथ ज्ञान का माध्यम ही नहीं, जीवन का मार्गदर्शक बन गया। गुरु अर्जुन देव जी स्वयं गुरु ग्रंथ साहिब को सर्वोच्च सम्मान देते थे। उनके जीवन में यह भावना इतनी गहरी थी कि वे ग्रंथ साहिब को ऊँचे आसन पर विराजमान करते और स्वयं नीचे विश्राम करते। यह दृश्य हमें बताता है कि उनके लिए वाणी केवल पढ़ने की वस्तु नहीं थी, वाणी जीवन से बड़ी थी, क्योंकि वह मनुष्य को जीवन का सही अर्थ बताती थी।

    तीन अमूल्य वस्तुएँ : सत्य, संतोष और नाम

    गुरु अर्जुन देव जी ने गुरु-वाणी को एक सुंदर थाली के रूप में प्रस्तुत किया-

    “थाल विचि तिनि वस्तु पईओ, सतु संतोखु विचारो।
    अमृत नाम ठाकुर का पइओ, जिसका सभसु अधारो।”

    इस थाली में तीन वस्तुएँ हैं- सत्य, संतोष और प्रभु के नाम का विचार। कितनी सरल बात है और कितनी गहरी भी! आज मनुष्य जीवन में बहुत कुछ प्राप्त करना चाहता है, लेकिन भीतर शांति नहीं है। उपलब्धियाँ बढ़ती हैं, इच्छाएँ भी बढ़ती जाती हैं। ऐसे समय में गुरु-वाणी हमें संतोष सिखाती है। वह हमें बताती है कि मनुष्य की वास्तविक समृद्धि केवल उसके पास मौजूद वस्तुओं में नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद सत्य और शांति में है।

    गुरु नानक देव जी : पीड़ित मानवता की आवाज

    गुरु नानक देव जी का जीवन ऐसे समय में आया जब समाज अनेक प्रकार के संकटों से गुजर रहा था। राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध, सामाजिक भेदभाव, धार्मिक आडंबर और सामान्य जन की पीड़ा—इन सबको उन्होंने अपनी आँखों से देखा, लेकिन उन्होंने केवल घटनाओं का वर्णन नहीं किया। उन्होंने दुःख को महसूस किया। बाबर के आक्रमण के समय हुई हिंसा ने गुरु नानक देव जी के संवेदनशील हृदय को गहराई से विचलित किया। उनकी वाणी में उस पीड़ा की प्रतिध्वनि सुनाई देती है-

    “खुरासान खसमाना कीआ, हिंदुस्तानु डराइआ।”

    और फिर वे परमात्मा से प्रश्न करते हैं-

    “एती मार पई करलाणे, तै की दरदु न आइआ?”

    यह प्रश्न केवल एक संत का प्रश्न नहीं है। यह हर उस मनुष्य का प्रश्न है, जिसका हृदय दूसरे मनुष्य के दुःख से व्यथित होता है।

    गुरु नानक देव जी ने सत्ता के अन्याय पर भी मौन नहीं साधा। उन्होंने कहा-

    “कलि काती, राजे कासाई, धरमु पंखु करि उडरिआ।”

    जब शासन से धर्म और नैतिकता समाप्त हो जाती है, तब रक्षक ही भक्षक बन जाता है। गुरु नानक की महानता यह है कि उन्होंने केवल दूसरों को दोष नहीं दिया। उन्होंने समाज के भीतर मौजूद आडंबर, पाखंड और नैतिक पतन को भी चुनौती दी। उनकी दृष्टि में धर्म का अर्थ केवल बाहरी पहचान नहीं था। धर्म का अर्थ था- सत्य का आचरण।

    मानवता के लिए एक साझा संदेश

    गुरु ग्रंथ साहिब की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसकी समावेशी चेतना है। इसमें अनेक संतों की वाणी का संगम हमें बताता है कि आध्यात्मिक सत्य किसी सीमा में बंद नहीं होता। भिन्न प्रदेश, भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि और भिन्न जीवनानुभव रखने वाले संत एक ही परम सत्य की ओर संकेत करते हैं। यह भारत की आत्मा की विशेषता है—विविधता में एकता केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि यहाँ की आध्यात्मिक अनुभूति भी है, इसीलिए गुरु ग्रंथ साहिब का संदेश केवल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। जो व्यक्ति सत्य, प्रेम, सेवा, विनम्रता और ईश्वर की ओर बढ़ना चाहता है, उसके लिए इसमें प्रेरणा है।

    सेवा : भक्ति का जीवंत रूप

    गुरु परंपरा ने सेवा को जीवन का महत्वपूर्ण अंग बनाया। गुरुद्वारों की लंगर परंपरा इसका अद्भुत उदाहरण है। एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करना मनुष्य को यह अनुभव कराता है कि भोजन के सामने न कोई बड़ा है, न छोटा; न धनवान, न निर्धन; न ऊँचा, न नीचा। यह केवल भोजन की व्यवस्था नहीं, बल्कि मानव समानता का संस्कार है। सेवा हमें अपने से बाहर देखने की शक्ति देती है। किसी भूखे को भोजन देना, किसी पीड़ित की सहायता करना, किसी निराश व्यक्ति को सहारा देना, ये सब ईश्वर की सेवा के ही रूप हैं।

    आज के समय में गुरु-वाणी की प्रासंगिकता

    आज संसार तकनीक से बहुत आगे बढ़ गया है, लेकिन मनुष्य के भीतर का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। अकेलापन है, तनाव है, असंतोष है, सामाजिक विभाजन है और अनेक प्रकार के वैचारिक संघर्ष हैं। ऐसे समय में गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी हमें फिर सरल जीवन की ओर बुलाती है— सत्य बोलो। संतोष रखो। अहंकार छोड़ो। सेवा करो। अन्याय के सामने मौन मत रहो। मनुष्य को मनुष्य समझो। और परमात्मा को जीवन के केंद्र में रखो। यही संदेश मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है।

    प्रकाश उत्सव : बाहर नहीं, भीतर भी प्रकाश

    प्रकाश उत्सव का वास्तविक अर्थ केवल दीप जलाना नहीं है। वास्तविक प्रकाश तब होगा जब हमारे भीतर का अंधकार कम होगा। जब क्रोध के स्थान पर करुणा आएगी। जब अहंकार के स्थान पर विनम्रता आएगी। जब स्वार्थ के स्थान पर सेवा आएगी। जब भेदभाव के स्थान पर आत्मीयता आएगी। जब अन्याय के सामने भय के स्थान पर साहस खड़ा होगा। गुरु ग्रंथ साहिब हमें यही आंतरिक प्रकाश देता है। गुरु नानक देव जी ने पीड़ित मानवता की आवाज सुनी। गुरु अर्जुन देव जी ने विभिन्न संतों की वाणी को एक महान आध्यात्मिक ग्रंथ में संजोया। आगे गुरु परंपरा ने त्याग, सेवा, साहस और धर्म की रक्षा का आदर्श प्रस्तुत किया।

    इस पूरी परंपरा को यदि एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है- ईश्वर से प्रेम करो और उसकी सृष्टि से भी प्रेम करो। आज श्री गुरु ग्रंथ साहिब प्रकाश उत्सव के अवसर पर यही संकल्प सबसे सुंदर श्रद्धांजलि होगा कि हम गुरु-वाणी को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। हमारे विचारों में सत्य हो, हमारे व्यवहार में विनम्रता हो, हमारे कर्म में सेवा हो, हमारे हृदय में करुणा हो, हमारे जीवन में साहस हो और हमारी दृष्टि में सम्पूर्ण मानवता के प्रति आत्मीयता हो। तभी गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश केवल गुरुद्वारों में नहीं, हमारे हृदयों में भी प्रकाशित होगा।श्री गुरु ग्रंथ साहिब प्रकाश उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    वाहेगुरु जी का खालसा। वाहेगुरु जी की फतेह।।

    (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्‍ठ स्‍तम्‍भकार हैं)

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