
दतिया। दतिया विधानसभा उपचुनाव 2026 (Datia Assembly By-election 2026) अब सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं बल्कि साख का सवाल बन चुका है। भाजपा ने बूथ से लेकर शक्ति केंद्र तक मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं की फौज उतार दी है, जबकि कांग्रेस भी पूरी ताकत के साथ मैदान में है। 30 जुलाई को होने वाला मतदान कई बड़े नेताओं की राजनीतिक साख की परीक्षा भी बनेगा।
भाजपा और कांग्रेस के लिए दतिया चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, दोनों उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और राजेंद्र शुक्ल, पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल समेत कई मंत्री, सांसद और संगठन पदाधिकारी क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं। पार्टी ने बूथ और शक्ति केंद्र स्तर तक जिम्मेदारियां तय कर दी हैं।
अलग-अलग समाजों के नेताओं को जातीय समीकरण साधने और प्रत्येक मतदाता तक पहुंचने का लक्ष्य दिया गया है। भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के पक्ष में घर-घर संपर्क अभियान चलाया जा रहा है। वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस भी सक्रिय हो गई है और जातिगत समीकरणों पर फोकस कर रही हैं।
1. नरोत्तम मिश्रा की सबसे बड़ी परीक्षा
दतिया की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा होने के बावजूद इस बार भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया। इसके बावजूद वे पूरी ताकत से आशुतोष तिवारी के लिए प्रचार कर रहे हैं। भाजपा की जीत को उनकी संगठनात्मक ताकत और प्रभाव से जोड़कर देखा जाएगा, जबकि हार होने पर टिकट बदलने के फैसले पर सवाल उठ सकते हैं। वहीं, सीएम यादव के नेतृत्व और संगठन की रणनीति का भी टेस्ट होगा। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद यह हेमंत खंडेलवाल के सामने पहला उपचुनाव है। बूथ मैनेजमेंट, संगठन की सक्रियता और चुनावी रणनीति की सफलता या विफलता का सीधा असर उनके नेतृत्व पर भी पड़ेगा।
2. कांग्रेस के सामने सीट बचाने की चुनौती
यह उपचुनाव कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के कारण हो रहा है। ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस सीट को अपने कब्जे में बनाए रखना है। पार्टी ने पूरा संगठन मैदान में उतार दिया है। यदि कांग्रेस सीट बचाने में सफल रहती है तो यह भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जाएगा।, वहीं, जीतू पटवारी के नेतृत्व पर उठ रहे सवालों पर विराम लगेगा।
3. संगठन और बूथ मैनेजमेंट का असली मुकाबला
उपचुनावों में अक्सर स्थानीय संगठन और बूथ प्रबंधन निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भाजपा ने चुनाव कार्यालय, मीडिया सेंटर और बूथ स्तर तक व्यापक तैयारी की है। दूसरी ओर कांग्रेस भी स्थानीय नेटवर्क और वरिष्ठ नेताओं के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने में जुटी है। मतदान वाले दिन किस पार्टी का संगठन अधिक सक्रिय रहता है, यह परिणाम पर सीधा असर डाल सकता है।
4. स्थानीय मुद्दे बनाम राजनीतिक प्रतिष्ठा
दतिया में सड़क, पेयजल, रोजगार, किसानों की समस्याएं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे मौजूद हैं। लेकिन चुनाव प्रचार में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है। सवाल यह है कि मतदाता स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देगा या फिर राजनीतिक संदेश देने के लिए वोट करेगा।
5. बगावत और वोटों का समीकरण
भाजपा में टिकट वितरण के बाद नाराजगी खुलकर सामने आई थी। वहीं कांग्रेस भी अपने स्थानीय समीकरण साधने में जुटी रही। इसके अलावा निर्दलीय और अन्य उम्मीदवार भी कुछ इलाकों में वोटों का समीकरण प्रभावित कर सकते हैं। यदि मुकाबला कांटे का हुआ तो थोड़े से वोट भी परिणाम बदल सकते हैं।
2008 से लेकर 2023 तक के विधानसभा चुनावों पर एक नजर
2008: भाजपा के डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने बसपा के राजेंद्र भारती को 11,233 वोटों से हराया। उस चुनाव में बसपा दूसरे और कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही।
2013: मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमट गया। नरोत्तम मिश्रा ने कांग्रेस के राजेंद्र भारती को 12,081 वोटों से पराजित कर लगातार दूसरी जीत दर्ज की।
2018: दतिया में कांटे की टक्कर देखने को मिली। भाजपा और कांग्रेस के बीच जीत-हार का अंतर घटकर सिर्फ 2,656 वोट रह गया।
2023: कांग्रेस ने 15 साल बाद सत्ता का समीकरण बदल दिया। राजेंद्र भारती ने भाजपा के नरोत्तम मिश्रा को 7,742 वोटों से हराकर सीट अपने नाम कर ली।
क्यों निर्णायक माने जा रहे हैं 10 हजार वोट?
दतिया के पिछले चार विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि यहां जीत का अंतर लगातार बदलता रहा है। कभी 12 हजार से अधिक वोटों की बढ़त रही तो कभी महज ढाई हजार वोटों से फैसला हुआ। पिछले चुनाव में कांग्रेस की जीत का अंतर भी 7,742 वोट रहा। ऐसे में राजनीतिक दलों का मानना है कि यदि करीब 10 हजार मतदाताओं का रुझान बदलता है, तो पूरा चुनावी परिणाम पलट सकता है। यही वजह है कि दोनों दल बूथ स्तर तक वोटरों को साधने में जुटे हैं।
‘जनता को विकास करने वाला जनप्रतिनिधि चाहिए’
भाजपा प्रवक्ता डॉ. हितेश वाजपेयी ने कहा कि दतिया उपचुनाव में जनता एकतरफा भाजपा का समर्थन करेगी। उन्होंने कहा कि मतदाता मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में हुए विकास और सुशासन पर भरोसा जता रहे हैं। जनता को रोज नए नाटक करने वाले “बहरूपिए” नहीं, बल्कि विकास करने वाली सरकार और विधायक चाहिए।
‘भाजपा की नीतियों से उसके अपने कार्यकर्ता भी नाराज’
कांग्रेस प्रवक्ता अभिनव बरोलिया ने कहा कि दतिया की जनता अहंकार और दमनकारी राजनीति का जवाब देगी। उन्होंने दावा किया कि भाजपा की नीतियों से उसके अपने कार्यकर्ता भी नाराज हैं। कांग्रेस स्थानीय मुद्दों और जनता के विश्वास के आधार पर यह उपचुनाव जीतकर सीट बरकरार रखेगी।
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