नई दिल्ली। चुनाव आयोग (Boat Commission) के कामकाज को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा 2023 का कानून भी सुप्रीम कोर्ट (SC) के सामने है। चुनाव आयोग (EC) के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट के बाद अदालत में नियुक्ति व्यवस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे हैं। 23 सितंबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो सदस्यीय पीठ ने इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अलग-अलग राय दी। इसके बाद मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया, ताकि बड़ी पीठ गठित करने पर फैसला हो सके।
23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त एसएस संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों अधिकारियों ने कुछ फैसले उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए जाने का मुद्दा उठाया था। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता डेटाबेस के संचालन से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग के अधिकारियों ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि SIR समेत आयोग के सभी फैसलों को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी मिली थी। आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
इसी घटनाक्रम के बीच सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। 2023 के कानून के तहत नियुक्ति वाली चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। इस व्यवस्था में पहले मौजूद भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है। इस तरह तीन सदस्यीय समिति में सरकार के दो प्रतिनिधि होते हैं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा इस बात पर अलग-अलग राय पर पहुंचे कि मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं। हालांकि, दोनों ने अंततः मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने पर सहमति जताई, ताकि उचित संख्या वाली बड़ी पीठ के गठन पर फैसला लिया जा सके।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि 2023 के ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ’ फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कार्यपालिका के एकछत्र नियंत्रण से अलग रखने के सिद्धांत पर जोर दिया था। उनके अनुसार मौजूदा मामले में मुख्य सवाल यह है कि 2023 का कानून उस संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप है या नहीं।
जस्टिस दत्ता ने नियुक्ति समिति की संरचना पर भी सवाल उठाए। उन्होंने केंद्रीय मंत्री की भूमिका को लेकर कहा कि मंत्रिमंडल सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत से काम करता है, इसलिए सरकार के प्रतिनिधि की स्वतंत्रता पर सवाल उठ सकता है।
उन्होंने विपक्ष के नेता की भूमिका को भी समिति में सरकार के दो सदस्यों की तुलना में अलग स्थिति वाला बताया। फैसले में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी निष्पक्ष दिखाई देने वाली छवि के महत्व पर जोर दिया गया। जस्टिस दत्ता ने कहा कि केवल संस्थागत स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, बल्कि संस्था को स्वतंत्र दिखाई देना भी जरूरी है।
दूसरी ओर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने मामले में महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों को देखते हुए इसे पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजने का पक्ष लिया। दोनों जजों की राय अलग होने के कारण मामला अब मुख्य न्यायाधीश के समक्ष है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग की स्थापना और उसके अधिकारों का आधार है। संविधान ने संसद को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में कानून बनाने की व्यवस्था दी थी। लंबे समय तक नियुक्ति के लिए अलग संसदीय कानून नहीं था।
2023 में संसद ने Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act बनाया। इससे पहले 2023 के अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की समिति से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की व्यवस्था की थी, जिसे संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक लागू रहना था। बाद में 2023 के कानून ने इस व्यवस्था में बदलाव करते हुए मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्री को चयन समिति में शामिल किया।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर बहस नई नहीं है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल में भी आयोग और सरकार के बीच अधिकारों को लेकर टकराव देखने को मिला था। 1993 में चुनाव आयुक्तों की संख्या बढ़ाकर तीन की गई थी। इसके बाद आयोग में मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला लेने की व्यवस्था प्रभावी हुई।
वर्तमान विवाद में भी यही सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि तीन सदस्यीय आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया किस तरह संचालित होती है और अलग-अलग राय की स्थिति में संस्थागत संतुलन कैसे कायम रखा जाता है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में संधू और जोशी की 14 आपत्तियों का उल्लेख है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि उसके सभी फैसले तीनों सदस्यों की मंजूरी से लिए गए।
फिलहाल नियुक्ति कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम संवैधानिक फैसला नहीं हुआ है। दो सदस्यीय पीठ के मतभेद के बाद मामला मुख्य न्यायाधीश के पास पहुंच चुका है। आगे यह तय होना है कि इस चुनौती पर बड़ी संविधान पीठ सुनवाई करेगी या नहीं और यदि सुनवाई होती है तो 2023 की नियुक्ति व्यवस्था की संवैधानिक वैधता पर अदालत क्या निष्कर्ष देती है।
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