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लिव-इन रिश्ते पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- ’15 साल साथ रहने के बाद यौन उत्पीड़न का दावा क्यों?’

April 28, 2026

भोपाल। लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए आपसी सहमति वाले रिश्तों पर सवाल उठाए हैं। अदालत (Court) ने एक महिला से पूछा कि जब वह 15 साल तक एक पुरुष के साथ सहमति से रही और उनका एक बच्चा भी है, तो अब यौन उत्पीड़न का आरोप कैसे लगाया जा सकता है।

दरअसल, महिला ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसके पूर्व लिव-इन पार्टनर के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया था। मामला शादी का झूठा वादा कर यौन शोषण करने के आरोप से जुड़ा है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि कोई रिश्ता आपसी सहमति से बना है, तो उसमें अपराध का सवाल उठाना कठिन हो जाता है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि महिला लंबे समय तक उस पुरुष के साथ रही और उनके बीच एक बच्चा भी है, ऐसे में अचानक लगाए गए आरोपों पर विचार जरूरी है। सुनवाई के दौरान महिला के वकील ने बताया कि उसके पति की मृत्यु के बाद उसकी मुलाकात आरोपी से हुई थी और उसने शादी का वादा किया था। इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि शादी से पहले ही वह उसके साथ रहने क्यों लगी।


  • अदालत ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी बंधन नहीं होता और ऐसे रिश्तों में अलग होने का जोखिम बना रहता है। यदि पार्टनर रिश्ता खत्म कर देता है, तो यह हर स्थिति में आपराधिक मामला नहीं बनता। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विवाह हुआ होता, तो महिला के पास अधिक मजबूत कानूनी विकल्प होते, जैसे दूसरी शादी (बिगैमी) के खिलाफ कार्रवाई या गुजारा-भत्ता की मांग। बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए अदालत ने महिला को अन्य कानूनी उपाय अपनाने की सलाह दी, खासतौर पर बच्चे के भरण-पोषण के लिए सहायता मांगने का विकल्प बताया। साथ ही, दोनों पक्षों को आपसी सुलह के लिए मेडिएशन का रास्ता अपनाने की भी सलाह दी गई।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी को जेल भेजने से महिला को प्रत्यक्ष लाभ नहीं होगा, जबकि बच्चे के भविष्य के लिए आर्थिक सहायता सुनिश्चित करना ज्यादा जरूरी है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी कर दोनों पक्षों से संभावित समझौते की संभावना तलाशने को कहा है। यह मामला मध्य प्रदेश का है, जहां हाई कोर्ट पहले ही आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर चुका है।

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