
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को केंद्र सरकार (Central government) से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून में संशोधन करने का आग्रह किया है। कोर्ट ने कहा कि बलात्कार पीड़िताओं (Rape victims) के मामलों में गर्भावस्था के अंतिम चरण में भी गर्भपात कराने के लिए कोई गर्भधारण अवधि संबंधी प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ( CJI ) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की उपचारात्मक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में 15 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की 30 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति वाले हालिया आदेश पर पुनर्विचार की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट कहा कि कानूनी ढांचा समय के साथ विकसित होना चाहिए और बलात्कार पीड़िताओं की गरिमा व मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कृपया अपने कानून में संशोधन करें कि बलात्कार या ऐसे मामलों में गर्भावस्था होने पर समय सीमा लागू न हो। कानून को समय के साथ तालमेल बिठाते हुए सुसंगत होना चाहिए।
बता दें कि इस महीने की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय पीड़िता को सात महीने की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी थी। अदालत ने कहा था कि किसी को अपनी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हालांकि, AIIMS की मेडिकल टीम ने अदालत को बताया कि 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने पर गंभीर विकृतियों वाला जीवित शिशु पैदा होने की संभावना है। साथ ही नाबालिग मां को दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम, यहां तक कि भविष्य में प्रजनन क्षमता खोने का खतरा भी हो सकता है। AIIMS ने इन्हीं आधारों पर उपचारात्मक याचिका दायर की थी।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने AIIMS का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा कि इस चरण में गर्भपात चिकित्सकीय रूप से उचित नहीं है और गर्भावस्था जारी रखना बच्चे के हित में बेहतर होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि किसी भी निर्णय से पहले नाबालिग और उसके माता-पिता को पूर्ण चिकित्सकीय परिणामों की काउंसलिंग दी जाए।
पीठ ने AIIMS के रुख पर जताई सख्त आपत्ति
पीठ ने AIIMS के रुख पर सख्त आपत्ति जताई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह फैसला नाबालिग लड़की और उसके माता-पिता का है, न कि राज्य या किसी चिकित्सा संस्थान का। उन्होंने कहा कि अनचाही गर्भावस्था किसी पर थोपी नहीं जा सकती। सोचिए, वह बच्ची है। उसे अभी पढ़ाई करनी चाहिए थी, लेकिन हम उसे मां बनाना चाहते हैं। यह बाल यौन शोषण का मामला है। पीड़िता को जीवन भर मानसिक आघात और पीड़ा झेलनी पड़ेगी।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अपने नागरिकों का सम्मान करें। माता-पिता को आंकड़े दिखाएं। अगर वे बच्चे को रखना चाहें तो ठीक है, लेकिन यदि उन्हें लगता है कि मानसिक स्वास्थ्य खतरे में है तो वे निर्णय लेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को गर्भवती महिला से विकल्प छीनने का अधिकार नहीं है और सरकार व नागरिकों के बीच टकराव पैदा नहीं किया जाना चाहिए। इस दौरान कोर्ट ने संकेत दिया कि नाबालिग और उसके माता-पिता को विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा पूर्ण जानकारी दिए जाने के बाद निर्णय लेने की छूट होगी। अगर वे कोई रास्ता चुनते हैं तो अदालत उस पर विचार करेगी।
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