नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने चेक बाउंस और दिवालिया कानून से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी विवाद को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। अब तीन जजों की विशेष पीठ (Special Seats) यह तय करेगी कि दिवालिया प्रक्रिया के दौरान मिलने वाला ‘मोरेटोरियम’ क्या चेक बाउंस के आपराधिक मामलों पर भी लागू होगा या नहीं।
मामला कॉरपोरेट और बैंकिंग सेक्टर से जुड़ा होने के कारण काफी अहम माना जा रहा है। सवाल यह है कि यदि कोई कंपनी या व्यक्ति दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रहा हो और उसके खिलाफ रिकवरी की कार्यवाही पर रोक लगी हो, तो क्या उसके द्वारा जारी चेक के बाउंस होने पर भी आपराधिक मुकदमे रोके जा सकते हैं।
Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) के तहत जब किसी कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू होती है, तब अदालत उसकी संपत्तियों की सुरक्षा के लिए सभी रिकवरी और वसूली संबंधी कार्यवाहियों पर अस्थायी रोक लगा देती है। इसे ही मोरेटोरियम कहा जाता है। इसका उद्देश्य कंपनी को दोबारा खड़ा करने या संपत्तियों का सही तरीके से निपटारा कर लेनदारों को भुगतान सुनिश्चित करना होता है।
इसी मुद्दे पर ‘दिनेशचंद सुराणा बनाम यूको बैंक’ मामले में विवाद खड़ा हुआ। इसमें सवाल उठा कि क्या कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया के दौरान Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत चल रहे चेक बाउंस मामलों को रोकने के लिए मोरेटोरियम का सहारा ले सकता है।
जस्टिस J.B. Pardiwala और जस्टिस K.V. Viswanathan की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए इसे बड़ी बेंच को भेजने की सिफारिश की। जस्टिस पारदीवाला ने 151 पन्नों का विस्तृत फैसला लिखते हुए कहा कि यह मुद्दा व्यापक कानूनी व्याख्या की मांग करता है।
अब तक 2021 के एक पुराने फैसले के आधार पर यह माना जाता रहा कि चेक बाउंस की कार्यवाही मूल रूप से सिविल प्रकृति की होती है, भले ही उसे आपराधिक कानून के तहत चलाया जाता हो। उस फैसले में इसे “आपराधिक भेड़िये के कपड़ों में सिविल भेड़” कहा गया था।
हालांकि, वर्तमान बेंच ने इस सोच से असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि चेक बाउंस कानून का उद्देश्य केवल पैसा वसूलना नहीं, बल्कि व्यापारिक लेन-देन में विश्वास बनाए रखना भी है। इसलिए इसे आपराधिक स्वरूप दिया गया है।
बेंच ने टिप्पणी की कि यदि चेक बाउंस मामलों में आरोपियों को मोरेटोरियम का लाभ दे दिया गया, तो इससे लोग अपनी आपराधिक जिम्मेदारी से बचने के लिए दिवालिया प्रक्रिया का दुरुपयोग कर सकते हैं।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि चेक बाउंस मामलों में मुआवजे की वसूली वाला हिस्सा सिविल प्रकृति का है। ऐसे में केवल मुआवजे की रिकवरी पर मोरेटोरियम लागू करने पर विचार किया जा सकता है, ताकि दिवालिया व्यक्ति या कंपनी की संपत्तियां सुरक्षित रह सकें और अन्य लेनदारों के हित प्रभावित न हों।
इसके अलावा अदालत ने यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत दिवालिया मामलों में कंपनी के डायरेक्टर्स को भी Insolvency and Bankruptcy Code की धारा 96 और 101 के तहत कुछ परिस्थितियों में मोरेटोरियम का संरक्षण मिल सकता है।
अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच अंतिम फैसला सुनाएगी। यह निर्णय बैंकिंग सेक्टर, कॉरपोरेट कंपनियों, निवेशकों और कंपनी निदेशकों की कानूनी जिम्मेदारियों पर दूरगामी असर डाल सकता है।
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