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भोजशाला फैसले के बाद फिर चर्चा में मंदिर-मस्जिद विवाद, जानिए देश के बड़े मामलों की पूरी कहानी

May 17, 2026

धार। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (MP High Court) के हालिया फैसले के बाद एक बार फिर देश में मंदिर-मस्जिद विवादों (Temple-Mosque disputes) को लेकर बहस तेज हो गई है। अदालत ने धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर मानते हुए बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के उस पुराने आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें केवल मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज की अनुमति दी गई थी, जबकि हिंदुओं की पूजा पर रोक थी।



  • यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश में कई धार्मिक स्थलों को लेकर कानूनी लड़ाइयां जारी हैं। इनमें अयोध्या, मथुरा और वाराणसी जैसे मामले सबसे ज्यादा चर्चा में रहे हैं। अधिकांश विवादों में उपासना स्थल अधिनियम 1991 का हवाला दिया जाता है, जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बरकरार रखा जाएगा। इस कानून की वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।

    मथुरा का कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद

    उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित 13.37 एकड़ क्षेत्र को लेकर विवाद लंबे समय से अदालत में है। हिंदू पक्ष का दावा है कि जहां आज शाही ईदगाह मस्जिद मौजूद है, वहां पहले भगवान कृष्ण का जन्मस्थान मंदिर था, जिसे औरंगजेब के शासनकाल में तोड़कर मस्जिद बनाई गई। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष उपासना स्थल अधिनियम 1991 का हवाला देकर यथास्थिति बनाए रखने की मांग कर रहा है।

    इस मामले में हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं की ओर से दाखिल करीब 18 मुकदमे इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित हैं। अदालत ने अगस्त 2024 में मुस्लिम पक्ष की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिनमें इन मुकदमों की वैधता पर सवाल उठाए गए थे।



  • काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी मामला

    वाराणसी का ज्ञानवापी विवाद देश के सबसे संवेदनशील मामलों में गिना जाता है। हिंदू पक्ष का कहना है कि मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद बनाई गई थी। वहीं मुस्लिम समुदाय का दावा है कि मस्जिद में सदियों से नमाज अदा की जा रही है और मामला उपासना स्थल कानून के तहत संरक्षित है।

    2021 में पांच महिलाओं द्वारा पूजा की अनुमति मांगने के बाद मामला और चर्चित हुआ। सर्वे के दौरान वजूखाने में मिली संरचना को हिंदू पक्ष शिवलिंग बता रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष उसे फव्वारा प्रणाली का हिस्सा कहता है। सुप्रीम कोर्ट ने उस स्थान को संरक्षित रखने के साथ मुस्लिम पक्ष के नमाज के अधिकार को भी बरकरार रखा था।

    संभल की शाही जामा मस्जिद पर बढ़ा विवाद

    उत्तर प्रदेश के संभल में स्थित शाही जामा मस्जिद भी 2024 में विवादों के केंद्र में रही। हिंदू पक्ष ने दावा किया कि मस्जिद का निर्माण हरिहर मंदिर को तोड़कर कराया गया था। स्थानीय अदालत के आदेश पर हुए सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए।

    मुस्लिम पक्ष ने आरोप लगाया कि बिना पर्याप्त सुनवाई के जल्दबाजी में सर्वे कराया गया। मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है और सुप्रीम कोर्ट ने वहां यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।

    कुतुब मीनार परिसर का कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद मामला

    दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर में स्थित कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद को लेकर भी अदालत में विवाद चल रहा है। हिंदू और जैन पक्षों ने दावा किया कि यहां पहले 27 मंदिर थे, जिन्हें तोड़कर मस्जिद बनाई गई। याचिका में देवी-देवताओं की पुनर्स्थापना की मांग की गई थी।

    हालांकि निचली अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि अतीत की घटनाओं के आधार पर वर्तमान में शांति व्यवस्था प्रभावित नहीं की जा सकती। इस फैसले के खिलाफ अपील अभी लंबित है।

    हुबली का ईदगाह मैदान विवाद

    कर्नाटक के हुबली ईदगाह मैदान को लेकर भी बड़ा विवाद सामने आया था। 2022 में प्रशासन ने वहां गणेश उत्सव की अनुमति दी थी, जिसका मुस्लिम संगठन अंजुमन-ए-इस्लाम ने विरोध किया। हाई कोर्ट ने कहा कि जमीन नगर निगम की है और संगठन केवल पट्टेदार है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह स्थायी धार्मिक स्थल नहीं माना जा सकता।

    मलाली मस्जिद में हिंदू शैली की संरचना पर विवाद

    कर्नाटक की मलाली मस्जिद उस समय सुर्खियों में आई जब मरम्मत कार्य के दौरान वहां हिंदू शैली की वास्तुकला जैसी आकृतियां सामने आईं। इसके बाद कुछ हिंदू संगठनों ने अदालत में सर्वे की मांग की। मामला अभी कानूनी प्रक्रिया में है।

    उपासना स्थल कानून पर टिकी कई मामलों की दिशा

    देश में चल रहे अधिकांश मंदिर-मस्जिद विवादों के केंद्र में उपासना स्थल अधिनियम 1991 है। इस कानून की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। ऐसे में आने वाले समय में इन विवादों पर अदालतों के फैसले देश की राजनीति और सामाजिक माहौल दोनों पर बड़ा असर डाल सकते हैं।

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