
जबलपुर। गौर पुलिस चौकी चौकी क्षेत्र के सालीवाड़ा में 24 मई 2026 की आधी रात को अपने रिश्तेदार के घर में सो रहे शिवेंद्र कुमार पर भू-माफिया शुभम चौबे, हिमांशु दुबे, लखन दुबे, शंकर दुबे, शिवप्रसाद दुबे, छोटू दुबे, दीपांशु दुबे, रामनारायण दुबे, दिलराज ढिल्लों और शारदा दुबे ने हमला बोला। उपद्रवियों ने आलोक शुक्ला के साथ भी मारपीट की और वाहनों को नुकसान पहुंचाया। आरोपी घर में घुसे और तोडफ़ोड़ करते रहे । आरोपियों ने किरायेदारों से मारपीट, चाकूबाजी और वाहनों में जमकर तोडफ़ोड़ की। 112 वाहन पर पथराव कर पुलिसकर्मियों के मोबाइल छीनने की कोशिश हुई। पीडि़त पक्ष के पास कॉल डिटेल, वीडियो और मेडिकल रिपोर्ट मौजूद हैं। इसके उलट गौर चौकी और बरेला थाना पुलिस ने नामजदों पर कार्रवाई करने के बजाय फरियादी पक्ष पर ही एफआईआर ठोक दी। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सूर्यकांत शर्मा को 4-5 बार आवेदन देने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला। हद तो तब हो गई जब गत दिवस मामले में खुद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक का फोन बरेला टीआई संगीता सिंह ने नहीं उठाया। पीडि़त न्याय के लिए भटक रहे हैं और आरोपी खुलेआम घूमते हुए लगातार धमकियां दे रहे हैं।
आर्थिक संकट और दबंगों का खौफ
फरियादी अपने हाथ, पैर, सिर और पेट की गंभीर चोटों के साथ महीनों से थाने और दफ्तरों की चौखट नाप रहे हैं। लगातार शारीरिक व मानसिक पीड़ा के चलते उनका कामकाज पूरी तरह ठप हो चुका है, जिससे भारी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। पूरे परिवार पर अब भी जानलेवा हमले का साया मंडरा रहा है। कानून का खौफ खत्म होने से हमलावर बेखौफ होकर समझौते का दबाव बना रहे हैं।
जांच और चालान की स्थिति पर पर्दा
घटना के इतने महीने बीत जाने के बाद भी अदालत में चालान पेश करने को लेकर स्थानीय पुलिस रहस्यमयी चुप्पी साधे हुए है। फरियादी जब भी जानकारी मांगने चौकी अथवा थाने पहुंचते हैं, तो उन्हें केवल टालमटोल और कोरे आश्वासन ही मिलते हैं। कागजी कार्रवाई को दबाकर रखा गया है ताकि दबंगों को कानूनी शिकंजे से दूर रखा जा सके और पूरा मामला बिना किसी ठोस नतीजे के उलझा रहे।
जनता जाए तो जाए कहाँ
क्षेत्र में पुलिसिंग का ढर्रा इतना लचर हो चुका है कि मातहत कर्मचारी अपने ही वरिष्ठ अफसरों के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं। जब जिले के उच्च पदस्थ अधिकारी का संपर्क अपने ही थाना प्रभारी से नहीं हो पा रहा, तब आम नागरिक की सुनवाई की उम्मीद बेमानी साबित होती है। इस प्रशासनिक विफलता ने कानून व्यवस्था के दावों की कलई खोलकर रख दी है, जिससे जनता का भरोसा उठ रहा है।
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