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₹5 वाले चिप्स और नमकीन पैकेट पर मंडराया संकट, तीन साल में आधे से भी कम हुआ वजन..

November 05, 2026

नई दिल्ली ।देश (India) में चिप्स (Chips), वेफर्स (Wafers) और नमकीन (Namkeen) खरीदने वाले ग्राहकों के लिए आने वाले समय में छोटा पैकेट खरीदना मुश्किल हो सकता है। अब तक पांच रुपये में मिलने वाले चिप्स और नमकीन के पैकेट कंपनियों के लिए कमाई का आकर्षक जरिया रहे हैं, लेकिन बढ़ती उत्पादन लागत (Production Cost) ने इस कारोबार का गणित बदल दिया है। आलू, खाद्य तेल और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के कारण कंपनियों का मुनाफा काफी कम हो गया है। यही वजह है कि स्नैक्स निर्माता (Snack Manufacturers) अब पांच रुपये वाले पैकेट की बिक्री को लेकर नई रणनीति तैयार कर रहे हैं।

पिछले तीन से चार वर्षों में पांच रुपये वाले चिप्स पैकेट का वजन तेजी से घटा है। पहले जहां इस कीमत पर 25 से 30 ग्राम तक चिप्स मिलते थे, वहीं अब कई ब्रांडों के पैकेट में केवल 11 से 14 ग्राम उत्पाद रह गया है। इस तरह तीन साल के भीतर पैकेट का वजन आधे से भी कम हो चुका है। कंपनियों ने कीमत पांच रुपये पर बनाए रखने के लिए मात्रा में कटौती की, लेकिन अब इसके आगे वजन घटाना आसान नहीं रह गया है। कंपनियों को आशंका है कि लगातार मात्रा कम होने से ग्राहक नाराज हो सकते हैं और उनकी खरीदारी प्रभावित हो सकती है।

दरअसल, पांच और दस रुपये वाले पैकेट भारतीय स्नैक्स बाजार का बड़ा हिस्सा हैं। बिस्किट और नमकीन कंपनियों की कुल बिक्री में इनकी हिस्सेदारी लगभग 60 से 65 प्रतिशत बताई जाती है। ग्रामीण बाजारों में इनकी मांग विशेष रूप से अधिक है, क्योंकि कम कीमत के कारण ग्राहक इन्हें आसानी से खरीद पाते हैं। बालाजी वेफर्स के सालाना राजस्व में करीब 65 प्रतिशत योगदान छोटे पैकेटों का है। पारले प्रोडक्ट्स की लगभग 75 प्रतिशत कमाई वैल्यू सेगमेंट से आती है। वहीं, गोपाल स्नैक्स को करीब 60 प्रतिशत राजस्व पांच रुपये वाले वेफर्स पैकेट से मिलता है।

पांच रुपये के एक वेफर्स पैकेट की बिक्री से कंपनियों को मिलने वाली रकम का बड़ा हिस्सा अलग-अलग खर्चों में चला जाता है। इसमें लगभग एक रुपये टैक्स और डिस्ट्रीब्यूटर मार्जिन के रूप में खर्च होता है। करीब तीन रुपये कच्चे माल, खाद्य तेल और पैकेजिंग पर लगते हैं। इसके बाद फैक्ट्री संचालन और परिवहन का खर्च निकालने पर कंपनी के पास केवल 15 से 20 पैसे का मुनाफा बचता है। इतनी कम कमाई में उत्पादन और वितरण का पूरा कारोबार चलाना कंपनियों के लिए चुनौती बन गया है।

पिछले छह महीनों में कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी ने दबाव और बढ़ाया है। उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों में पैदावार कम होने के कारण कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू की कीमतें 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। दूसरी ओर, आयात शुल्क में बढ़ोतरी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें चढ़ने से खाद्य तेल 25 से 35 प्रतिशत तक महंगा हुआ है। चिप्स बनाने में आलू और तेल दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए इनकी कीमत बढ़ने का सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ता है।

पैकेजिंग भी कंपनियों के लिए महंगा खर्च बन गई है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से प्लास्टिक फिल्म की लागत प्रभावित हुई है। स्नैक्स के रैपर बनाने में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक फिल्म हाल के हफ्तों में करीब 20 प्रतिशत महंगी हुई है। एक साल पहले की तुलना में इसकी कीमतों में 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

इन परिस्थितियों में कंपनियां अब पांच रुपये के बजाय दस और बीस रुपये वाले पैकेट की बिक्री बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं। बालाजी वेफर्स और क्रैक्स बनाने वाली डीएफएम फूड्स ने पिछले कुछ महीनों में पांच रुपये वाले पैकेट पर खुदरा विक्रेताओं का मार्जिन करीब 10 प्रतिशत घटाया है। इसके उलट दस और बीस रुपये वाले पैकेट पर बेहतर मार्जिन दिया जा रहा है, ताकि दुकानदार भी बड़े पैकेट बेचने में अधिक रुचि दिखाएं।

कंपनियां पैकेट के आकार और डिजाइन में बदलाव करके भी खर्च कम करने की कोशिश कर रही हैं। प्रताप स्नैक्स के सीईओ अमित कुमत के अनुसार, कंपनी पैकेट की सीलिंग वाली जगह 12 मिलीमीटर से घटाकर आठ मिलीमीटर कर रही है। इसी तरह 200 मिलीमीटर के पैकेट को 190 मिलीमीटर का किया जा रहा है। इस बदलाव से पैकेजिंग लागत में करीब 10 प्रतिशत तक कमी लाने का लक्ष्य है।


  • इसके साथ ही कंपनियां प्रीमियम स्नैक्स की ओर भी रुख कर रही हैं। कोरियन बीबीक्यू, चिली लेमन जैसे नए फ्लेवर, हेल्दी विकल्प और बड़े पैकेट बाजार में उतारे जा रहे हैं। गोपाल स्नैक्स ने पाम ऑयल मुक्त उत्पाद, 300 रुपये प्रति किलो कीमत वाले प्रीमियम नमकीन और 190 ग्राम के जिपर पैकेट पेश किए हैं। कंपनी को उम्मीद है कि अगले पांच वर्षों में ऐसे उत्पादों की मांग बढ़ सकती है। अब देखना होगा कि बढ़ती लागत के बीच पांच रुपये वाला पैकेट कंपनियों के कारोबार में अपनी जगह बनाए रख पाता है या नहीं।

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