img-fluid

जब पिंडदान का साक्षी बना कौवा, फिर माता सीता ने क्यों दिया उसे श्राप?

September 27, 2026

डेस्क: पितृ पक्ष में पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है. इन दिनों कौवे को भोजन कराने का भी विशेष महत्व माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कौवे को पितरों का स्वरूप और यमराज का दूत माना जाता है. यही वजह है कि पितृ पक्ष में कौवे को भोजन खिलाकर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पौराणिक कथा में इसी कौवे को माता सीता के श्राप का सामना करना पड़ा था?

मान्यता के अनुसार, इस घटना का संबंध बिहार के गया में हुए राजा दशरथ के पिंडदान से है. कहा जाता है कि माता सीता ने पिंडदान के दौरान मौजूद कुछ साक्षियों को श्राप दिया था. इनमें फल्गु नदी, गाय, कौवा, ब्राह्मण और केतकी का फूल शामिल थे. दरअसल, पिंडदान की सच्चाई के बारे में पूछे जाने पर इन साक्षियों ने माता सीता का साथ नहीं दिया और असत्य कह दिया. इसके बाद माता सीता ने उन्हें श्राप दिया.

पौराणिक कथा के अनुसार, वनवास के समय पितृ पक्ष के दौरान भगवान राम और लक्ष्मण राजा दशरथ का पिंडदान करने के लिए गया पहुंचे थे. दोनों भाई पिंडदान की सामग्री जुटाने के लिए चले गए. इसी बीच शाम होने लगी और पिंडदान का शुभ समय बीतने का डर सताने लगा. माता सीता ने समय को देखते हुए वहीं फल्गु नदी के किनारे पिंडदान करने का निर्णय लिया. उन्होंने रेत से पिंड तैयार किए और फल्गु नदी, वटवृक्ष, गाय, कौवे और एक ब्राह्मण को इस कर्म का साक्षी बनाया. इसके बाद उन्होंने विधि के अनुसार राजा दशरथ का पिंडदान किया.


  • जब भगवान राम और लक्ष्मण वापस लौटे तो उन्हें बताया गया कि माता सीता पिंडदान कर चुकी हैं. भगवान राम को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने वहां मौजूद साक्षियों से पूछा कि क्या वास्तव में माता सीता ने राजा दशरथ का पिंडदान किया था. कथा के अनुसार, भगवान राम के क्रोध के डर से फल्गु नदी, गाय, कौवा और ब्राह्मण समेत अन्य साक्षियों ने सच बताने के बजाय कह दिया कि ऐसा कोई पिंडदान नहीं हुआ. इस बात से माता सीता बेहद नाराज हो गईं.

    माता सीता ने जब देखा कि कौवे ने भी सत्य का साथ नहीं दिया और पिंडदान होने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने उसे श्राप दे दिया. पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता सीता ने कहा कि कौवा चाहे कितना भी खाए, उसका पेट कभी नहीं भरेगा. इसी वजह से कौवे के अकेले भोजन करने के बजाय झुंड में या आपस में झगड़कर भोजन करने की परंपरा दिखाई देती है. कथा में ये भी कहा जाता है कि माता सीता ने कौवे को आकस्मिक मृत्यु का श्राप दिया था. इस तरह कौवे को मिले श्राप की यह कथा गया में राजा दशरथ के पिंडदान से जुड़ी हुई बताई जाती है.

    कथा के अनुसार, पिंडदान की सच्चाई छिपाने वाले साक्षियों में गाय भी शामिल थी. इससे नाराज होकर माता सीता ने गाय को श्राप दिया कि उसका मुख हमेशा अपवित्र माना जाएगा और वह जूठन खाने वाली मानी जाएगी. हालांकि, माता सीता ने गाय को पूरी तरह अशुभ नहीं माना. उन्होंने वरदान दिया कि गाय का शरीर और उसके दूसरे अंग पवित्र माने जाएंगे. इसी वजह से हिंदू धर्म में गाय और उससे मिलने वाले गोबर व मूत्र को भी पवित्र और पूजनीय माना जाता है.

    कौवे को लेकर जुड़ी इस पौराणिक कथा के बावजूद पितृ पक्ष में उसे भोजन कराने की परंपरा आज भी चली आ रही है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, कौवे को पितरों का प्रतीक माना जाता है. इसलिए श्राद्ध के भोजन का एक हिस्सा कौवे को खिलाने की परंपरा है. मान्यता है कि कौवे के रूप में पितर भोजन ग्रहण करते हैं और इससे पूर्वजों की आत्मा को तृप्ति मिलती है. यही कारण है कि पितृ पक्ष में कौवे का घर के आसपास आना और उसे भोजन कराना धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है.

    Share:

  • जिन मासूमों को अपनों ने छोड़ा, उन्हें मिला घर; नवजातों की बदली जिंदगी

    Sun Sep 27 , 2026
    गाजीपुर: जिस उम्र में नवजात को मां की ममता, पिता की गोद और परिवार का सहारा चाहिए होता है, उस उम्र में गाजीपुर के छह मासूमों ने जिंदगी की शुरुआत अपनों से दूर रहकर की. किसी को जन्म के बाद छोड़ दिया गया तो किसी को सड़क किनारे झाड़ियों में ऐसी जगह छोड़ दिया गया, […]
    सम्बंधित ख़बरें
    लेटेस्ट
    खरी-खरी
    का राशिफल
    जीवनशैली
    मनोरंजन
    अभी-अभी
  • Archives

  • ©2026 Agnibaan , All Rights Reserved