चंडीगढ़। पंजाब के गुरदासपुर जिले (Gurdaspur district of Punjab) में स्थित डेरा बाबा नानक रेलवे स्टेशन (Railway station) देश के उन ऐतिहासिक रेलवे स्टेशनों में शामिल है, जो भारत-पाकिस्तान विभाजन (Partition of India and Pakistan) की यादों को आज भी संजोए हुए हैं। करीब 100 वर्ष पुराने इस स्टेशन की सबसे अनोखी पहचान यह है कि यहां एक स्थान पर पहुंचते ही रेलवे ट्रैक अचानक समाप्त हो जाता है। कभी यही रेलमार्ग पाकिस्तान तक जाता था, लेकिन 1947 के विभाजन के बाद यह सफर हमेशा के लिए थम गया।
कभी पाकिस्तान तक दौड़ती थीं ट्रेनें
आजादी से पहले डेरा बाबा नानक से होकर गुजरने वाली रेल लाइन भारत और तत्कालीन अविभाजित पंजाब के विभिन्न इलाकों को जोड़ते हुए आज के पाकिस्तान तक पहुंचती थी। इसी मार्ग से लोग रिश्तेदारों से मिलने जाते, व्यापार करते और रोजमर्रा की यात्रा करते थे। उस समय यह स्टेशन यात्रियों की चहल-पहल और लगातार ट्रेनों की आवाजाही के लिए जाना जाता था।
बंटवारे ने रोक दिया रेल संपर्क
साल 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद दोनों देशों के बीच सीमाएं तय हुईं और कई रेल मार्ग बंद कर दिए गए। डेरा बाबा नानक से आगे जाने वाली रेलवे लाइन भी यहीं समाप्त कर दी गई। आज स्टेशन से आगे बढ़ने पर कुछ दूरी बाद पटरियां खत्म हो जाती हैं और आसपास झाड़ियां व वीरानी नजर आती है। यह दृश्य विभाजन के बाद बदल चुके इतिहास की खामोश गवाही देता है।
ब्रिटिश काल में निर्मित यह रेलवे स्टेशन आज भी अपनी पुरानी वास्तुकला के साथ मौजूद है। स्टेशन की इमारत और पुराने ट्रैक उस दौर की याद दिलाते हैं, जब यहां यात्रियों की भारी भीड़ हुआ करती थी। हालांकि अब इस मार्ग पर ट्रेनें नहीं चलतीं, लेकिन इतिहास और रेलवे विरासत में रुचि रखने वाले लोग इस स्थान को देखने के लिए पहुंचते हैं।
करतारपुर कॉरिडोर के बाद बढ़ी आवाजाही
डेरा बाबा नानक का धार्मिक महत्व भी काफी अधिक है। यह स्थान सिखों के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव से जुड़ा है। करतारपुर कॉरिडोर खुलने के बाद इस क्षेत्र में श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी है। हालांकि रेलवे स्टेशन पर पहले जैसी रेल गतिविधियां शुरू नहीं हुई हैं, लेकिन आसपास का इलाका पहले की तुलना में अधिक सक्रिय हो गया है।
बुजुर्गों की यादों में बसता है पुराना दौर
स्थानीय लोगों के अनुसार, विभाजन से पहले स्टेशन दिनभर यात्रियों से गुलजार रहता था। बाजारों में रौनक रहती थी और रेल सेवा लोगों के जीवन का अहम हिस्सा थी। बंटवारे के बाद न केवल रेल संपर्क टूट गया, बल्कि कई परिवार भी दोनों देशों में बंट गए। आज भी इलाके के बुजुर्ग उस दौर को याद कर भावुक हो जाते हैं।
सीमा से पहले ही थम जाता है सफर
डेरा बाबा नानक रेलवे स्टेशन की सबसे खास बात यह है कि जहां रेल की पटरियां समाप्त होती हैं, वहां से अंतरराष्ट्रीय सीमा अधिक दूर नहीं है। बताया जाता है कि ट्रैक का अंतिम हिस्सा भारत-पाकिस्तान सीमा से लगभग 600 मीटर पहले खत्म हो जाता है। कभी इसी मार्ग से ट्रेनें पाकिस्तान की ओर जाती थीं, लेकिन अब यह रेल लाइन इतिहास का हिस्सा बन चुकी है।
इतिहास की जीवंत निशानी
डेरा बाबा नानक रेलवे स्टेशन आज भी इस बात का प्रतीक है कि समय के साथ सीमाएं बदल सकती हैं, लेकिन इतिहास की यादें मिटती नहीं हैं। यहां समाप्त होती रेल की पटरियां केवल लोहे की लाइन नहीं, बल्कि उस दौर की गवाह हैं जब दोनों देशों के बीच आवाजाही सामान्य थी। यही वजह है कि यह स्टेशन आज भी इतिहास, रेलवे विरासत और भारत-पाकिस्तान विभाजन को समझने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल बना हुआ है।
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