
नई दिल्ली। इस्लामिक हिजरी कैलेंडर (Islamic Hijri Calendar) का पहला महीना मुहर्रम (Muharram) धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि यह वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, लेकिन इसकी पहचान किसी उत्सव या उल्लास से नहीं, बल्कि शहादत (Martyrdom), त्याग और आत्मचिंतन से जुड़ी हुई है। हर वर्ष मुहर्रम आने पर दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान कर्बला (Karbala) की ऐतिहासिक घटना को याद करते हैं, जिसने इस्लामिक इतिहास की दिशा बदल दी और सत्य तथा न्याय के लिए सर्वोच्च बलिदान (Sacrifice) की मिसाल कायम की।
मुहर्रम की 10वीं तारीख, जिसे अशूरा कहा जाता है, सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी दिन हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुए कर्बला की धरती पर शहादत प्राप्त की थी। इस घटना को केवल धार्मिक इतिहास ही नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों और इंसाफ की रक्षा के लिए दिए गए महान बलिदान के रूप में भी देखा जाता है। यही कारण है कि मुहर्रम का महत्व समय और सीमाओं से आगे बढ़कर मानवता के सार्वभौमिक संदेश से जुड़ जाता है।
इस्लामिक इतिहास के अनुसार, पैगंबर हजरत मोहम्मद के इंतकाल के बाद मुस्लिम समुदाय के नेतृत्व को लेकर मतभेद उत्पन्न हुए। समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलती गईं और जब यजीद सत्ता में आया तो उसने अपनी निष्ठा स्वीकार करने की मांग की। हजरत इमाम हुसैन ने इसे स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि शासन न्याय, सत्य और नैतिक सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए और अन्यायपूर्ण सत्ता का समर्थन नहीं किया जा सकता।
वर्ष 680 ईस्वी में वर्तमान इराक के कर्बला क्षेत्र में इमाम हुसैन और उनके परिवार तथा साथियों को घेर लिया गया। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्हें कई दिनों तक पानी और आवश्यक संसाधनों से वंचित रखा गया। इसके बाद हुए संघर्ष में इमाम हुसैन सहित उनके अनेक परिजनों और समर्थकों ने शहादत प्राप्त की। यह घटना इस्लामिक इतिहास की सबसे मार्मिक घटनाओं में गिनी जाती है और इसी की स्मृति में मुहर्रम के दौरान मातम मनाया जाता है।
मुहर्रम का मातम केवल शोक प्रकट करने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने, सत्य के पक्ष में अडिग रहने और मानवता की रक्षा के लिए किए गए बलिदान को याद करने का प्रतीक भी है। विशेष रूप से शिया समुदाय इस अवसर पर मजलिसों का आयोजन करता है, काले वस्त्र धारण करता है और कर्बला की घटना का स्मरण करता है। कई स्थानों पर ताजिया जुलूस भी निकाले जाते हैं, जो इमाम हुसैन की शहादत के प्रति श्रद्धांजलि का प्रतीक माने जाते हैं।
ताजिया मुहर्रम की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह बांस, कागज और अन्य सजावटी सामग्री से तैयार किया जाने वाला प्रतीकात्मक ढांचा होता है, जो कर्बला में स्थित इमाम हुसैन के रौजे की याद दिलाता है। भारत सहित कई देशों में श्रद्धालु ताजिया जुलूस में भाग लेकर शहादत को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। समय के साथ अनेक धार्मिक विद्वानों ने यह भी संदेश दिया है कि मुहर्रम के अवसर पर समाज सेवा, रक्तदान और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्यों के माध्यम से भी इमाम हुसैन के आदर्शों को आगे बढ़ाया जा सकता है।
मुहर्रम का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था। यह पर्व सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, न्याय और नैतिक मूल्यों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। कर्बला की शहादत केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष, साहस, धैर्य और मानवता की रक्षा के लिए प्रेरित करने वाली अमर विरासत है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने का संदेश देती है।
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