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क्‍या कोविड-19 वैक्‍सीन के बूस्‍टर डोज की होगी जरूरत? जानें क्‍या कहते हैं विशेषज्ञ

सामान्‍य आबादी को कोविड-19 वैक्‍सीन का बूस्‍टर शॉट देने की जरूरत नहीं है। प्रतिष्ठित जर्नल ‘द लैंसेट’ में वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्‍ट्रीय समूह ने अपनी समीक्षा में यही लिखा है। इन वैज्ञानिकों में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) और अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्‍ट्रेशन (FDA) के एक्‍सपर्ट्स शामिल हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि बूस्‍टर डोज से जो भी फायदे मिलेंगे, उतनी डोज से करोड़ों ऐसे लोगों को सुरक्षित किया जा सकता है जिन्‍हें अभी तक वैक्‍सीन नहीं लगी है। उन्‍होंने कहा कि कमजोर इम्‍युन सिस्‍टम वाले लोगों में बूस्‍टर डोज काम आ सकती है, मगर आम आबादी को इसकी जरूरत नहीं है।

‘द लैंसेट’ में वैज्ञानिकों ने क्‍या लिखा है?
जर्नल में छपे रिव्‍यू की प्रमुख लेखिका एना-मारिया हेनाओ (WHO) ने लिखा है, ‘समग्र रूप से देखें तो अभी मौजूद शोध इस बात के पर्याप्‍त सबूत नहीं देते कि गंभीर बीमारी से मिलने वाली सुरक्षा काफी हद तक कम हो जाती है। अगर वैक्‍सीन को वहां दिया जाए जहां उनकी सबसे ज्‍यादा जरूरत है तो उससे महामारी का जल्‍द खात्‍मा हो सकेगा।’ इस लेख को लिखने वालों में WHO की सौम्‍या स्‍वामीनाथन और माइक रायन भी शामिल हैं।

एक वक्‍त के बाद इम्‍युनिटी कम होने लगती है?
अमेरिका (America) के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (CDC) ने कई रिसर्च में कहा है कि डेल्‍टा वेरिएंट के खिलाफ वैक्‍सीन का असर कुछ समय बाद कम होने लगता है। हालांकि फिर भी सभी उम्र के लोगों में वैक्‍सीन से गंभीर बीमारी को रोकने में मदद मिलती है। 75 साल से ज्‍यादा उम्र के लोगों में ही अस्‍पताल में भर्ती होने की कुछ संभावना दिखी। वैक्‍सीन से बनने वाली एंटीबॉडीज भले ही वक्‍त के साथ कम हो जाएं, मगर शरीर वायरस को लंबे समय तक याद रख सकता है। अल्‍फा स्‍ट्रेन के मुकाबले डेल्‍टा स्‍ट्रेन के खिलाफ वैक्‍सीन थोड़ी कम असरदार हैं। एक्‍सपर्ट्स ने चेताया कि समय से पहले बूस्‍टर्स को प्रमोट नहीं करना चाहिए।

अमीर देश ही बजा रहे बूस्‍टर डोज का झुनझुना
पेशे से कॉर्डियोलॉजिस्‍टर (cardiologist) और महामारी विशेषज्ञ के. श्रीनाथ रेड्डी ने सोमवार को ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में अभी बूस्‍टर्स न दिए जाने की सलाह दी थी। उन्‍होंने लिखा कि जिन देशों के पास वैक्‍सीन का अच्‍छा-खासा स्‍टॉक है, वे यह नहीं जानना चाहते कि एंटीबॉडीज कम होने के बाद इम्‍युन सिस्‍टम (immune system) के बाकी कम्‍पोनेंट्स किस तरह की सुरक्षा देते हैं। वे बस वैक्‍सीन की अतिरिक्‍त डोज को ‘बूस्‍टर्स’ की तरह यूज करेंगे। रेड्डी ने कहा कि इजरायल ने ‘बूस्‍टर’ का जो बिगुल बजाया है, उसी शोर में बाकी रईस देश भी अतिरिक्‍त डोज की ओर बढ़ रहे हैं।


60 साल से कम उम्र वालों पर स्‍टडी नहीं
श्रीनाथ ने कई सवाल उठाए। क्‍या इन ‘बूस्‍टर’ डोज से ज्‍यादा और लंबे वक्‍त तक रहने वाली इम्‍युनिटी मिलेगी? अगर ऐसा है तो सभी को उसकी जरूरत होगी? इन सवालों के जवाब स्‍पष्‍ट नहीं हैं क्‍योंकि एक्‍स्‍ट्रा डोज लगाने की शुरुआत भर ही हुई है। इजरायल में हुई एक ताजा स्‍टडी बताती है कि 60 साल से ज्‍यादा उम्र वालों में फाइजर वैक्‍सीन (pfizer vaccine) की तीन डोज के बाद क्लिनिकल इन्‍फेक्‍शन के खतरे में 11 गुना की कमी और गंभीर इंफेक्‍शन के खतरे में 15 गुना कमी आई। हालांकि 60 साल से कम उम्र वालों पर ऐसी कोई रिसर्च नहीं है जबकि उन्‍हें गंभीर बीमारी होने का खतरा काफी कम है।

WHO ने क्‍या कहा? भारत क्‍या करे?
WHO ने ग्‍लोबल इक्विटी के आधार पर बूस्‍टर्स की खिलाफत की है। हालांकि यह जरूर कहा गया कि कमजोर इम्‍युन सिस्‍टम वाले और बुजुर्ग लोगों को एडिशनल डोज दी जा सकती हैं। डॉ रेड्डी कहते हैं कि भारत को एक्‍स्‍ट्रा डोज वाले रास्‍ते पर जाने की जल्‍दबाजी नहीं करनी चाहिए। पहले पूरी आबादी को वैक्‍सीन की दो डोज लग जाएं। जिन्‍हें ज्‍यादा खतरा है, उन्‍हें बूस्‍टर डोज देने पर विचार किया जा सकता है।

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