
यूं ही नहीं अग्निबाण बन जाता हूं मैं… शहर के कोने-कोने से सत्यता की कसौटी पर कस कर खबरें खोज लाता हूं मैं…पाठकों की दुखती नब्ज टटोलने वाला हाकिम हूं मैं…अच्छे कार्यो के लिए सरहाना के लिए पीठ थपथपाने से लेकर पाठकों के दुख दर्द को देख जिम्मेदारों के खिलाफ शब्द रूपी अग्निबाण चलाने वाला भी हूं मैं…खबरों के सागर में से विश्वनीय खबरों को ढूंढ कर लाने वाला गोताखोर हूं मैं…पाठकों की विश्वसनीयता की कार्यशाला में तराशा जाने वाला हीरा हूं मैं…सत्यता,सार्थकता और निडरता के दम पर पाठकों के मन की बातें जानने वाला हूं मैं… यूं ही नहीं अग्निबाण बन जाता हूं मैं…धूप, छांव, दिन-रात की परवाह किए बिना खबर रूपी मोतियों को चुनने के लिए दौड़ लगाता रहता हूं मैं… यूं ही नहीं अग्निबाण बन जाता हूं मैं…कई दफा मुश्किल राहे, मुश्किल पल सहना पढ़ता है, बहुत बार तो ना भी कहना पढ़ता है, तब कहीं पाठकों की खबरों की पंसद की परख कर पाता हूं मैं… यूं ही नहीं अग्निबाण बन जाता हूं मैं…
कर्मठता, जुनून और समर्पण की मिसाल है अग्निबाण
अपने काम के प्रति हर दिन नए जोश और जुनून के साथ ऐसी कर्मठता शायद ही कहीं देखने को मिले। मैंने आज तक अपने कार्य के प्रति इस तरह का समर्पण और लगन बहुत कम लोगों में देखी है। शायद यही कारण है कि प्रतिदिन होने वाले हवन में कर्मों की डाली जाने वाली आहुति से वह अग्निबाण निकलता है, जो लोगों के दिलों में अपनी अलग पहचान बनाता है। अपने काम के प्रति कर्मठता का पाठ पढ़ाने वाले कोई और नहीं, बल्कि अग्निबाण समूह के प्रमुख श्री राजेश चेलावत एवं श्री किशोर चेलावत हैं, जिन्हें हम सभी उनके द्वारा दिए गए अपनत्व और स्नेह के कारण आदरपूर्वक ‘बड़े भैया’ और छोटे भैया कहकर संबोधित करते हैं। अग्निबाण के जनक स्वर्गीय बाबूजी नरेशचन्द्रजी को देखने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला, लेकिन उनके साथ काम कर चुके लोगों से उनकी कार्यशैली के कई किस्से सुनने को मिले हैं। सभी बताते हैं कि बाबूजी अपने इरादों के बेहद पक्के थे। काम के प्रति उनका उत्साह, जुनून और कर्मठता देखते ही बनती थी। उस समय, जब सुबह के अखबारों की अपनी अलग पहचान हुआ करती थी, तब धारा के विपरीत बहने और भीड़ से हटकर चलने का जो साहस और दृष्टि उन्होंने दिखाई, वही आज मुझे उनकी छाया के रूप में आदरणीय बड़े भैया में दिखाई देती है। मैं यह इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि अगर सच मायनों में कोई व्यक्ति अग्निबाण को पल-पल जीता है, तो वह बड़े भैया हैं। अखबार के प्रति उनका लगाव और जुड़ाव प्रतिदिन देखने योग्य होता है। कड़ाके की ठंड हो, लगातार होती बारिश हो या फिर 44 डिग्री तापमान वाली भीषण गर्मी, वह अपनी कर्मठता से अपने साथ काम करने वालों में ऐसा जोश भरते हैं कि उसी का परिणाम है कि अन्य अखबारों की भीड़ में अग्निबाण हमेशा अलग और अग्रणी दिखाई देता है। दोनों भाइयों की कर्मठता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां सामान्य लोग भीषण गर्मी से बचने के उपाय खोजते हैं, वहीं वह आज भी मशीन रूम में 44 डिग्री तक के तापमान में अपने अधीनस्थों के साथ खड़े होकर अखबार गिनने का काम करते नजर आते हैं। मुझे तो याद भी नहीं कि अखबार से जुड़ा कोई ऐसा कार्य हो, जिसे भैया स्वयं न कर सकते हों। वह हर विभाग में पारंगत हैं। शायद यही कारण है कि अग्निबाण वर्षों से देश के नंबर वन सांध्य दैनिक अखबार के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। यह केवल एक अखबार नहीं, बल्कि समर्पण, कर्मठता और जुनून की वह परंपरा है, जिसे बाबूजी ने शुरू किया और जिसे दोनों भाई आज भी उसी ऊर्जा और आत्मीयता के साथ आगे बढ़ा रहे हैं… -निलेश राठौर
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved