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संगठन पर ममता की मजबूत पकड़ से बागियों की राह मुश्किल, ‘मूल TMC’ की लड़ाई क्यों पड़ती दिख रही भारी?

June 16, 2026

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी सियासी उठापटक के बीच पार्टी संगठन पर ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की मजबूत पकड़ ने बागी खेमे की रणनीति को फिलहाल कमजोर कर दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बागी सांसदों के अलग रास्ता अपनाने और संगठनात्मक समर्थन की कमी के चलते ‘असली पार्टी’ पर दावा करना आसान नहीं होगा।


  • संगठनात्मक ताकत क्यों बनी ममता की सबसे बड़ी ढाल?

    राजनीतिक मामलों में केवल सांसदों और विधायकों की संख्या ही निर्णायक नहीं होती, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे का समर्थन भी अहम माना जाता है। इसमें राष्ट्रीय कार्यकारिणी, राज्य इकाइयों, जिला अध्यक्षों और संगठन के विभिन्न पदाधिकारियों का समर्थन देखा जाता है।

    यही वजह है कि बागी खेमे के लिए सिर्फ विधायकों या सांसदों के आंकड़ों के आधार पर मूल पार्टी पर दावा करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी संगठन में अब भी ममता बनर्जी का प्रभाव मजबूत बना हुआ है।

    बागी सांसदों ने क्यों चुना अलग रास्ता?

    रिपोर्ट्स के अनुसार, बागी सांसदों ने सीधे ‘असली TMC’ होने का दावा करने की बजाय कथित तौर पर National Citizens Party of India (NCPI) में विलय का रास्ता चुना। माना जा रहा है कि यह कदम संभावित अयोग्यता (डिस्क्वालिफिकेशन) की कार्रवाई से बचने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि महाराष्ट्र में Eknath Shinde और Ajit Pawar के मामलों की तरह पार्टी पर नियंत्रण हासिल करने की उम्मीद यहां फिलहाल कमजोर पड़ती दिख रही है।

    बागी विधायकों और सांसदों की अलग राह से बढ़ा असमंजस

    बताया जा रहा है कि विधानसभा स्तर पर बागी विधायक और संसदीय स्तर पर बागी सांसद फिलहाल अलग रणनीति पर चलते दिखाई दे रहे हैं। इससे ममता बनर्जी के लिए राहत की स्थिति बनती नजर आ रही है।

    विश्लेषकों के अनुसार, यदि बागी विधायक भी NCPI में शामिल होते हैं, तो राजनीतिक समीकरण और जटिल हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में राज्य में भाजपा विरोधी राजनीति और केंद्र में एनडीए के साथ समीकरण जैसे सवाल खड़े होंगे।

    आगे क्या हो सकता है?

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, बागी नेता Sudip Bandyopadhyay ने संकेत दिए हैं कि संसद के मानसून सत्र से पहले दोनों गुट साझा रणनीति बना सकते हैं। हालांकि, पार्टी संगठन में मजबूत पकड़ और कानूनी-राजनीतिक प्रक्रियाओं को देखते हुए ममता बनर्जी का पक्ष फिलहाल ज्यादा मजबूत माना जा रहा है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि बागी खेमा अलग राजनीतिक पहचान मजबूत करता है या मूल पार्टी पर दावा करने की दिशा में बड़ा कदम उठाता है।

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