
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बृहस्पतिवार को कहा कि एक ही कर्ज के लिए मूल कर्जदार (Original Debtor) और उसके कॉरपोरेट गारंटर (Corporate Guarantor) दोनों के खिलाफ एक साथ दिवालिया की कार्यवाही चलाई जा सकती है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत ऐसा कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं है जो वित्तीय कर्जदाता को अपने बकाया की वसूली के लिए समानांतर कार्रवाई शुरू करने से रोकता हो। जस्टिस दत्ता ने 47 पृष्ठ के फैसले की शुरुआत में लिखा, ”न्यायाधीश को मनमाने ढंग से नए नियम बनाने का अधिकार नहीं है….।”
जस्टिस दत्ता ने कहा, ”ऋणदाता द्वारा अपने कर्ज के लिए गारंटी प्राप्त करने के औचित्य को पूरी तरह से समझना उचित जान पड़ता है। आईबीसी के अंतर्गत अधिकारों से संपन्न वित्तीय ऋणदाता को इन अधिकारों का प्रयोग करने में सक्षम होना चाहिए। इसी प्रकार, निर्णय लेने वाले प्राधिकरण का यह दायित्व है कि वह आवेदन की स्वतंत्र रूप से, उसके गुणों के आधार पर जांच करे।”इस फैसले ने भारतीय अनुबंध अधिनियम के उस मूलभूत सिद्धांत की पुष्टि की है जिसमें कहा गया है कि जमानतदार (गारंटर) का दायित्व मूल कर्जदार के दायित्व के बराबर होता है।
गारंटर को ऋण चुकाने से छूट नहीं
इसमें कहा गया कि यदि किसी कर्जदाता को एक दिवाला प्रक्रिया समाप्त होने के बाद ही दूसरी शुरू करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो गारंटी का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। फैसले में कहा गया, ”इसका मतलब यह होगा कि अंतरिम अवधि में गारंटर को ऋण चुकाने से छूट मिल जाएगी, जिसका प्रावधान आईबीसी में नहीं है।”
ICICI बैंक और SBI की अपील स्वीकार
यह फैसला आईसीआईसीआई बैंक और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) सहित प्रमुख वित्तीय संस्थानों द्वारा विभिन्न बुनियादी ढांचा और रियल एस्टेट कंपनियों के खिलाफ दायर अपीलों के एक समूह के बाद आया है। इसने ICICI बैंक और SBI की उन अपीलों को स्वीकार कर लिया, जिनमें पहले गारंटरों के खिलाफ दिवाला कार्यवाही रोक दी गई थी। इसने कंपनियों के निदेशकों की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें उन्होंने अपनी कंपनियों के खिलाफ समानांतर कार्यवाही रोकने का अनुरोध किया था।
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