
डेस्क: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच तेल सप्लाई को लेकर अक्सर चिंता जताई जाती है, लेकिन एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत की ऊर्जा सुरक्षा फिलहाल मजबूत स्थिति में है. रिपोर्ट बताती है कि भारत के पास कच्चे तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का कुल मिलाकर 250 मिलियन बैरल से ज्यादा का बफर स्टॉक मौजूद है. यह करीब 4,000 करोड़ लीटर ईंधन के बराबर है और इससे देश की सप्लाई चेन को करीब 7 से 8 हफ्तों तक सहारा मिल सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार यह भंडार कई जगहों पर सुरक्षित रखा गया है. इसमें मैंगलोर, पाडुर और विशाखापत्तनम में बने भूमिगत रणनीतिक तेल भंडार शामिल हैं. इसके अलावा जमीन पर बने बड़े टैंक, पाइपलाइन नेटवर्क और समुद्र में मौजूद जहाजों में भी तेल का स्टॉक रखा जाता है. इस व्यवस्था की वजह से अगर किसी एक सप्लाई चैन में दिक्कत आती है तो देश की ईंधन आपूर्ति प्रभावित नहीं होती.
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा खरीद की रणनीति को भी काफी बदल दिया है. पहले भारत करीब 27 देशों से तेल आयात करता था, जबकि अब यह संख्या बढ़कर करीब 40 देशों तक पहुंच गई है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत की तेल खरीद पूरी तरह राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होती है. दुनिया के अहम समुद्री रास्ते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अक्सर तेल सप्लाई के लिए संवेदनशील माना जाता है. लेकिन भारत के कुल कच्चे तेल आयात का केवल करीब 40 प्रतिशत हिस्सा ही इस रास्ते से आता है, जबकि बाकी 60 प्रतिशत तेल रूस, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और मध्य एशिया जैसे क्षेत्रों से वैकल्पिक रास्तों के जरिए पहुंचता है.
फरवरी 2026 तक रूस भारत को सबसे ज्यादा कच्चा तेल सप्लाई करने वाला देश बना हुआ है. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने कभी भी किसी देश की अनुमति पर निर्भर होकर रूसी तेल नहीं खरीदा. हालांकि भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करते हुए G7 के प्राइस कैप नियमों का भी पालन किया है. देश में 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम भी तेल की खपत कम करने में मदद कर रहा है. इसके जरिए हर साल करीब 44 मिलियन बैरल कच्चे तेल की जरूरत कम हो जाती है.
भारत की रिफाइनिंग क्षमता अब 258 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष तक पहुंच गई है, जबकि देश की खपत करीब 210 से 230 मिलियन मीट्रिक टन के बीच है. मजबूत रिफाइनिंग क्षमता की वजह से भारत ने रूस पर प्रतिबंध लगने के बाद यूरोप में ईंधन की कमी को पूरा करने में भी मदद की. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक फरवरी 2022 से फरवरी 2026 के बीच दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 0.67 प्रतिशत कम हुई, जबकि इसी अवधि में पाकिस्तान में पेट्रोल 55 प्रतिशत और जर्मनी में 22 प्रतिशत महंगा हुआ.
कीमतों को स्थिर रखने के लिए सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल पर करीब 24,500 करोड़ रुपये और एलपीजी पर लगभग 40,000 करोड़ रुपये का नुकसान भी उठाया. रिपोर्ट के अनुसार भारत की ऊर्जा नीति का मकसद ईंधन को सस्ता, उपलब्ध और टिकाऊ बनाए रखना है.
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved