तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी भीषण युद्ध (The Fierce War Raging in West Asia) के बीच फिलिस्तीनी संगठन हमास (Hamas) और ईरान (Iran) के रिश्तों में पहली बार सार्वजनिक मतभेद देखने को मिला है। हमास ने ईरान से अपील की है कि वह खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों पर हमले न करे। हालांकि संगठन ने यह भी कहा कि इजरायल और अमेरिका के हमलों के खिलाफ ईरान को आत्मरक्षा का अधिकार है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगभग 17 साल पुराने हमास-ईरान गठबंधन में यह पहली बार है जब हमास ने किसी मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से तेहरान को नसीहत दी है।
खाड़ी देशों पर हमलों को लेकर चिंता
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हमास ने बयान जारी कर कहा कि मौजूदा हालात में क्षेत्रीय तनाव और बढ़ाने से बचना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान, Israel और United States के साथ टकराव के बीच कई खाड़ी देशों को भी निशाना बना रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान की ओर से Qatar, United Arab Emirates, Bahrain और Saudi Arabia जैसे देशों पर हमलों की आशंका या कार्रवाई ने क्षेत्र में नई चिंता पैदा कर दी है।
दरअसल पिछले दो दशकों से ईरान हमास को आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक समर्थन देता रहा है। लेकिन खुफिया और कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि खाड़ी देशों से मिलने वाली आर्थिक मदद भी हमास के लिए बेहद अहम है।
माना जाता है कि यूएई से जुड़े कुछ नेटवर्कों के जरिए हमास और Gaza Strip की अर्थव्यवस्था को वित्तीय सहायता मिलती रही है। ऐसे में अगर ईरान खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल हमले तेज करता है, तो ये आर्थिक चैनल बाधित हो सकते हैं।
कतर को लेकर भी चिंता
हमास की राजनीतिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा कतर से संचालित होता है। संगठन को डर है कि अगर ईरानी हमलों से कतर नाराज होता है तो उसकी कूटनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है।
कतर ही वह देश है जो इजरायल समेत कई देशों के साथ हमास की बातचीत का प्रमुख माध्यम बना हुआ है। इसलिए संगठन नहीं चाहता कि क्षेत्रीय संघर्ष उसकी इस राजनीतिक और आर्थिक लाइफलाइन को प्रभावित करे।
रिश्तों में पहली बार दिखा सार्वजनिक मतभेद
करीब दो दशकों से ईरान हमास को धन, हथियार और प्रशिक्षण देता रहा है और उसे अपने क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क का हिस्सा मानता है। लेकिन मौजूदा हालात में हमास की यह अपील संकेत देती है कि वह ईरान के बढ़ते क्षेत्रीय संघर्ष से कुछ दूरी बनाए रखना चाहता है।
विश्लेषकों के मुताबिक हमास को डर है कि तेहरान की आक्रामक सैन्य रणनीति उसके उन राजनीतिक और वित्तीय समर्थन तंत्रों को खतरे में डाल सकती है, जिन पर संगठन काफी हद तक निर्भर करता है।
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