
मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर के मोतीपुर प्रखंड के कथैया गांव के चार मजदूर जो खाड़ी देशों में बने युद्ध जैसे हालात के बीच अपनी जान बचाकर किसी तरह घर लौटे हैं. उन्होंने वहां के डरावने अनुभव साझा किए. लालबाबू कुमार, रंजन कुमार, पंकज कुमार, अजय महतो और रामबाबू महतो ने बताया कि अबू धाबी में हर दिन डर के साए में गुजर रहा था.
मजदूरों ने कहा कि वे दास आइलैंड और अफशान इलाके में काम कर रहे थे, जहां अचानक हालात बिगड़ने लगे. रोज आसमान में मिसाइल और रॉकेट दिखाई देते थे. मोबाइल पर ‘मिसाइल अटैक’ का अलर्ट आता था, जिसके बाद जान बचाने के लिए तुरंत बाहर भागना पड़ता था. कुछ देर बाद ‘इट्स सेफ’ का मैसेज आता और हमलोग बाहर निकल काम करने लगते. लेकिन दिल का डर खत्म नहीं होता था.
साथ ही, मजदूरों ने आरोप लगाया कि संकट के समय कंपनी ने कोई मदद नहीं की. कई बार भारत भेजने की गुहार लगाने के बावजूद कंपनी ने साफ कह दिया कि सस्ता टिकट मिलने पर ही भेजा जाएगा. मजबूरी में लालबाबू और उनके भाई रंजन ने करीब 80 हजार रुपये खर्च कर खुद टिकट कराया और वापस अपने मुल्क भारत लौटा.
मजदूरों ने यह भी बताया कि उनकी दो महीने की सैलरी अभी तक अटकी हुई है. एक महीने की कमाई तो सिर्फ घर लौटने में ही खर्च हो गई. जान बचाना जरूरी था, इसलिए पैसे की चिंता नहीं की. उन्होंने बताया कि परिवार वालों का लगातार दबाव था कि किसी भी तरह वहां से निकलो और घर आ जाओ. इसलिए जैसे ही मौका मिला हमलोग छुट्टी लेकर घर आ गए.
करीब 18 महीने बाद घर लौटे लालबाबू ने कहा कि डर के बावजूद वे भविष्य में फिर से अबू धाबी जाना चाहेंगे, क्योंकि वहीं रोजगार के बेहतर अवसर हैं. हालांकि फिलहाल वे परिवार के साथ समय बिता रहे हैं और घर की मरम्मत जैसे कामों में जुटे हैं. लालबाबू के भाई रंजन की शादी 20 अप्रैल को है ऐसे में अभी घर पर शादी की तैयारी चल रही हैं. रंजन भी लालाबाबू के साथ आबुधाबी गए थे और वहीं रहते उनकी शादी तय हो गई थी.
मजदूरों के मुताबिक उनकी कंपनी के करीब 150 अन्य कामगार भी 15 अप्रैल तक भारत लौटने की तैयारी में हैं, जो अपने खर्च पर टिकट करा रहे हैं. कंपनी का कहना है कि टिकट सस्ती होगी तभी वो मजदूरों को वापस भेज पाएंगे. ऐसे में मजदूर अपने खर्च पर सुरक्षित लौटने की कवायद में लग गए हैं.
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