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AAP को बड़ा झटका, राघव चड्ढा नहीं, इस सांसद के जाने से हिला संगठन, केजरीवाल की रणनीति पर असर

April 25, 2026

नई दिल्ली। 24 अप्रैल 2026 का दिन आम आदमी पार्टी (AAP) के इतिहास में एक बड़े राजनीतिक मोड़ के रूप में दर्ज हो सकता है। वजह सिर्फ राघव चड्ढा (Raghav Chadha) का पार्टी से अलग होना नहीं, बल्कि यह है कि पहली बार पार्टी के संसदीय दल में इतनी बड़ी टूट देखने को मिली है। बागी सांसदों के एक समूह ने एक तिहाई संख्या के साथ भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का फैसला किया।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा झटका पार्टी को संदीप पाठक के जाने से लगा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राघव चड्ढा या अन्य नेताओं की तुलना में संदीप पाठक का पार्टी छोड़ना संगठन के लिए ज्यादा नुकसानदेह है, क्योंकि वे पर्दे के पीछे रहकर पार्टी की रणनीति और ढांचे को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहे थे।

संदीप पाठक को 2022 में राज्यसभा भेजे जाने के समय भले ही वे आम लोगों के बीच ज्यादा चर्चित नहीं थे, लेकिन पार्टी के भीतर उनका कद काफी बड़ा हो चुका था। 2016 में पार्टी से जुड़ने के बाद उन्होंने संगठन में लगातार अपनी पकड़ मजबूत की और अरविंद केजरीवाल का भरोसा जीता।

रणनीति के मास्टरमाइंड थे पाठक
संदीप पाठक को 2022 में संगठन महासचिव बनाया गया था और उन्हें पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था। पंजाब में पार्टी की जीत के पीछे उनकी रणनीति को अहम माना गया। इसके अलावा गोवा, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पार्टी के विस्तार और चुनावी रणनीति तैयार करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


  • यह भी उनके प्रभाव का संकेत है कि जब अरविंद केजरीवाल जेल में थे, तब उनसे मिलने के लिए जिन चुनिंदा लोगों को भेजा गया था, उनमें सुनीता केजरीवाल और बिभव कुमार के साथ संदीप पाठक भी शामिल थे।

    भरोसे से शिखर तक का सफर
    संदीप पाठक ने अपना राजनीतिक सफर दिल्ली डायलॉग कमीशन से शुरू किया, जहां उन्होंने आशीष खेतान के साथ काम किया। अपनी कार्यशैली और रणनीतिक क्षमता के दम पर उन्होंने जल्द ही पार्टी नेतृत्व का भरोसा जीत लिया। गुजरात और पंजाब में उनके काम ने उन्हें संगठन में शीर्ष स्तर तक पहुंचा दिया।

    राघव चड्ढा का जाना क्यों कम असरदार
    यह सही है कि राघव चड्ढा की सार्वजनिक पहचान अधिक रही है, लेकिन पिछले डेढ़ साल में उनकी पार्टी गतिविधियों में सक्रियता काफी कम हो गई थी। वे पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी का हिस्सा जरूर थे, लेकिन कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी सीमित हो चुकी थी। ऐसे में उनका अलग होना पहले से अनुमानित माना जा रहा था।

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