
सही बात है… देश (Country) संकट (crisis) में है तो सहूलियतें कम करना होंगी… जरूरतों पर अंकुश लगाना पड़ेगा… पेट्रोल-डीजल(Petrol and Diesel), विदेशी मुद्राओं को बचाना होगा… आयात घटाना होगा… देश की जरूरतों को देश में ही खपाना होगा… लेकिन यह सारा बोझ जनता पर डाल दिया जाए… नेताओं, मंत्रियों, सरकारों और अधिकारियों को न समझाया जाए… खुद पर न आजमाया जाए तो प्रधानमंत्रीजी कौन तोहमत नहीं लगाएगा और सवालों का क्या जवाब बन पाएगा… आपकी नुमाइंदगी में दो किलोमीटर का काफिला चलता है… मुख्यमंत्री की आवभगत में एक किलोमीटर का काफिला दौड़ता है… मंत्रियों की तिमारदारी में दो आगे, दो पीछे गाड़ियां वहां तक चलती हैं जहां तक उन्हें जाना होता है… एक जिले की पायलट गाड़ी दूसरे जिले तक जाती है… दूसरे जिले से उस जिले की गाड़ी पीछे लग जाती है और मंत्रीजी को मुकाम तक पहुंचाकर चैन की सांस ले पाती है… इस आने-जाने, गाने-बजाने में पता नहीं कितना हजारों लीटर पेट्रोल बह जाता है, जबकि कोई भी पायलट गाड़ी किसी मंत्री की जान बचा नहीं पाती है…जब मौत आती है तो निगल ही जाती है… लेकिन केवल झांकीबाजी के लिए जनता की गाड़ी कमाई फूंक दी जाती है… मंत्री-मुख्यमंत्री के कारवां के पीछे उनके समर्थकों की गाड़ी बेवजह दौड़ जाती है… प्रधानमंत्री गुहार लगा रहे हैं… जनता से समर्थन मांग रहे हैं तो उनके नाम की माला जपने वाले उनकी गुहार क्यों नहीं सुन पा रहे हैं… और वैसे भी प्रधानमंत्रीजी आपकी बात अधूरी रह गई…जब देश में चूल्हों पर भोजन बन रहा था, तभी आपने उज्ज्वला गैस योजना चलाकर महिलाओं से चौका-चूल्हा छुड़वा दिया… पर्यावरण की दुहाई देकर कोयलों की भ_ियों को बंद करा दिया… जब हम विदेशी मुद्राओं से गैस खरीद रहे थे तो देश की आत्मनिर्भरता को क्यों मिटाया गया…उज्ज्वला गैस के लिए तो अनुदान देकर चूल्हा छुड़वाया और धुंए की धधक से मुक्ति का प्रचार कराया… चलिए जो हुआ सो हुआ… अब जब गैस संकट है तो विकल्प तो उपलब्ध कराइए… इंडक्शन चूल्हों का उत्पादन बढ़वाइए…अब उन पर सब्सिडी देकर लोगों को लुभाइए…इंडक्शन से बिजली की खपत बढ़ेगी… उसे पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा के विकल्प के लिए चल रहे जनजागरण अभियान को चरम तक पहुंचाइए… कार पुल की आदत डालने के लिए लोगों को अपने अहंकार को मारना होगा… इसीलिए इसे राष्ट्रीय अभियान बनाइए…आज आपदा है, इसे अवसर में बदलकर हमेशा का संकट मिटाइए…देश में संकट चल रहा है, लेकिन आप डर मत बढ़ाइए…आपकी एक आवाज बहुत महत्व रखती है…इससे ऊर्जा और चेतना मिलती है…लेकिन यदि वही आवाज सहमती नजर आएगी तो देश की लड़ने की ताकत खत्म होती चली जाएगी…देश को आपकी आवाज के साथ रहना ही पड़ेगा, क्योंकि साधन नहीं रहेंगे तो जो हाथ में है वो भी साथ में नहीं रहेगा… इसीलिए दो बार, तीन बार बात मत दोहराइए… अब विकल्प में जुट जाईए …गैस की आग भले ही बुझ जाए चूल्हा जलता रहना चाहिए… वाहन भले ही थम जाएं… हाथ-पैर चलते रहना चाहिए…
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