
नई दिल्ली: भारत को अब खेती के लिए जरूरी खाद खरीदने में पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है. डायअमोनियम फॉस्फेट (DAP) की कीमतों में भारी उछाल आया है और भारत ने इसे युद्ध से पहले के स्तरों से करीब 40 फीसदी ज्यादा दाम पर खरीदने का सौदा किया है. इसकी बड़ी वजह मध्य-पूर्व में जारी तनाव और सप्लाई चेन पर बढ़ता दबाव माना जा रहा है. सवाल यह है कि क्या इसका असर आटा, चावल और दाल की कीमतों पर भी पड़ेगा?
रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन पोटाश लिमिटेड पश्चिमी तट पर डिलीवरी के लिए 7.05 लाख टन DAP उर्वरक 930 डॉलर प्रति टन की दर से डिलीवरी करेगी. वहीं पूर्वी तट के लिए 6.41 लाख टन उर्वरक 935 डॉलर प्रति टन के भाव पर लिया जाएगा. यह कीमत फरवरी के मुकाबले काफी ज्यादा है. फरवरी में भारत में DAP की स्पॉट कीमत करीब 667 डॉलर प्रति टन थी.
अगर खाद महंगी होती है तो खेती की लागत बढ़ती ही है. किसान फसल उत्पादन में खाद का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में सरकार अगर सब्सिडी नहीं बढ़ाती, तो किसानों पर सीधा असर पड़ सकता है. हालांकि फिलहाल सरकार किसानों को DAP पर सब्सिडी देती है, जिससे बाजार की पूरी महंगाई किसानों तक नहीं पहुंचती. मध्य-पूर्व का संकट इस वजह से भी अहम है क्योंकि फॉस्फेट उर्वरकों में इस्तेमाल होने वाले सल्फर की वैश्विक सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है. अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी तरह की रुकावट आती है तो सप्लाई और प्रभावित हो सकती है, जिससे खाद की कीमतें और बढ़ सकती हैं.
भारत ने हाल ही में यूरिया की भी बड़ी खरीद की है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने 25 लाख टन यूरिया खरीदा है, जिसके लिए पहले की तुलना में लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ी. यह खरीद ऐसे समय में हुई है जब देश में मानसून सीजन शुरू होने वाला है और किसान धान, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं. अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे आम लोगों की थाली महंगी होगी? अगर खाद लंबे समय तक महंगी रहती है तो खेती की कुल लागत बढ़ेगी. इसका असर धीरे-धीरे आटा, चावल, दाल और दूसरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई दे सकता है. हालांकि अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार सब्सिडी कितनी बढ़ाती है और आने वाले महीनों में वैश्विक हालात कैसे रहते हैं.
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