नई दिल्ली। CJI सूर्यकांत (Surya Kant) की विकास परियोजनाओं और पर्यावरण याचिकाओं को लेकर की गई टिप्पणियों पर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। पूर्व नौकरशाहों, वकीलों, (Former bureaucrats, lawyers,) पर्यावरण कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज समूहों ने खुली चिट्ठी लिखकर इन टिप्पणियों पर आपत्ति जताई है और कहा है कि इससे पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संवैधानिक अधिकार कमजोर पड़ सकते हैं।
11 मई को Supreme Court of India की पीठ, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत और Joymalya Bagchi शामिल थे, एक पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। यह मामला Gujarat के पिपावाव बंदरगाह विस्तार परियोजना से जुड़ा था।
याचिका में National Green Tribunal (NGT) के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें बंदरगाह विस्तार के लिए दी गई पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ अपील खारिज कर दी गई थी।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कथित तौर पर कहा था कि देश में लगभग हर विकास परियोजना को अदालत में चुनौती दी जाती है और इससे विकास प्रभावित होता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया था कि क्या कभी किसी पर्यावरण कार्यकर्ता ने किसी परियोजना का खुलकर समर्थन किया है।
सुनवाई के दौरान की गई इन टिप्पणियों को लेकर कई सामाजिक और कानूनी संगठनों ने नाराजगी जताई है। ‘कॉन्स्टिट्यूशन कंडक्ट ग्रुप’ नामक मंच से जुड़े 71 पूर्व सिविल सेवकों, वकीलों और कार्यकर्ताओं ने खुला पत्र लिखकर कहा कि इस तरह की टिप्पणियां पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को कमजोर कर सकती हैं।
पत्र में कहा गया कि यदि सर्वोच्च अदालत की ओर से ऐसे संकेत जाते हैं, तो निचली अदालतें और प्रशासनिक संस्थाएं भी पर्यावरण संबंधी चिंताओं को गंभीरता से लेने से बच सकती हैं।
खुले पत्र में पर्यावरण मंजूरी देने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए। इसमें कहा गया कि कई विशेषज्ञ निकायों में मुख्य रूप से सरकारी या सेवानिवृत्त अधिकारी शामिल होते हैं और वे अक्सर सरकार की परियोजनाओं को औपचारिक मंजूरी देने तक सीमित रह जाते हैं।
पत्र में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया कि वह पर्यावरणीय मूल्यांकन करने वाले निकायों पर आंख मूंदकर भरोसा न करे और नागरिकों की चिंताओं को भी महत्व दे।
इसी मुद्दे पर 600 से अधिक नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने भी अलग से हस्ताक्षर अभियान चलाकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि अदालत की टिप्पणियों से उन नागरिकों की छवि प्रभावित हो सकती है जो कानूनी प्रक्रिया के जरिए पर्यावरण संरक्षण की मांग उठाते हैं।
इसके अलावा 72 वकीलों, विधि छात्रों और कानून शिक्षकों के समूह ने भी प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर इन टिप्पणियों को वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुकदमे लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, उन्हें विकास विरोधी गतिविधि के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब देश में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को लेकर पर्यावरणीय मंजूरियों और जनसुनवाई की प्रक्रिया पर लगातार बहस चल रही है।
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