
जिस प्रकार इस मौसम में हमको प्रकृति ने अहसास करा दिया कि अब बहुत हो गया… जितनी तुमने मेरे साथ छेड़छाड़ की थी, ये उसी का परिणाम भुगत रहे हो। मालवा अब ठंडा नहीं रहा, बल्कि मरुस्थल की तरह तपने लगा और पारा 45 डिग्री तक पहुंच गया। अब इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होना चाहिए कि ये पारा अगले साल 45 के आंकड़े को पार कर जाए तो फिर न कहना कि प्रकृति हमारे साथ गलत कर रही है। हमने ही उसका दोहन किया और आज उसका परिणाम चुकाना पड़ रहा है। लगातार कटते पेड़, सीमेंट-कांक्रीट का बढ़ता जंगल, पक्की रोड बनाने की होड़, नए-नए प्रयोग और न जाने क्या-क्या कर डाला है हमने इस प्रकृति के साथ। जिसने हमें जीना सिखाया, उसे ही हमने नोंच-नोंचकर खा लिया है और अब वह दिन दूर नहीं है, जब मालव माटी गहन गंभीर, पग-पग रोटी डग-डग नीर की कहावत को भी झुठला देंगे। मालवा लोगों को रोजगार देता है और ऐसा वातावरण बनाता था कि देश के किसी भी कोने से आने वाला व्यक्ति यहां बस जाता था। मालवा का पहाड़ चारों ओर से सुरक्षित था। न तो यहां हद से ज्यादा ठंड पड़ती है और न ही हद से ज्यादा बारिश होती है। फिर गर्मी का तापमान भी कभी 40 के आंकड़े को पार कर जाता था तो गर्मी से हमारी उफ् निकल जाती थी, लेकिन अब सारे आंकड़े ध्वस्त हैं और हम अपने गुरूर में मस्त, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। 45 डिग्री तापमान ने इस बार इंदौर को अलर्ट कर दिया है। गर्मी तो गर्मी, उस पर से नीचे गिरता जलस्तर, पानी का अंधाधुंध दोहन, जिम्मेदारों की चुप्पी तो है ही, लेकिन यहां रहने वाले भी अपना कत्र्तव्य नहीं निभा पा रहे हैं, तभी तो इस बार प्रकृति ने हमें दोहरी मार दी है और दे रही है। इस बार के हालात को देखकर नहीं लगता कि अगले साल हमें पर्याप्त पानी अप्रैल तक भी मिल पाएगा या नहीं, क्योंकि अप्रैल में ही बोरिंग बोलने लगे थे और मई ने तो और भी कहर बरपाया। शहर के आधे से अधिक बोरिंग इस बार सूखे हो गए हैं और यही हाल रहा तो अगली बार पूरे बोरिंग ही सूखने के कगार पर आ जाएंगे। नर्मदा का पानी नाम का है और सप्लाय सिस्टम ऐसा बिगड़ा है कि जहां 45 का दावा किया जाता है वहां 15 मिनट भी पानी नहीं आता और नल बंद हो जाते हैं। जहां आधा घंटा देना हो वहां 5 से 10 मिनट पानी देकर जवाबदार अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। कहने को शहर नर्मदा के पानी पर अनाप-शनाप खर्च कर रहा है, लेकिन सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदारी नहीं होने के कारण इस बार जो हालात बने हैं वे बद से बदतर होते जा रहे हैं। गंदा पानी तो निगम पिला ही रहा है, इसका उदाहरण भागीरथपुरा कांड से बड़ा नहीं हो सकता। लोग किसी न किसी कारण से अस्पताल में भर्ती होते हैं, इलाज करवाते हैं, लेकिन जिम्मेदार इसका असल कारण पता नहीं लगा पाते हैं। खैर, अब डरना नहीं समझना होगा और आने वाली इस बड़ी समस्या से निपटने का उपाय अभी से करना होगा। बीमारी बड़ी है, लेकिन इलाज महंगा नहीं है। केवल एक पौधा ऐसा लगाएं जो ऑक्सीजन देने का काम करे। पानी बचाएं और उसे जमीन में उतारें, ताकि भूमिगत जलस्तर बना रहे। ये दो छोटे काम हैं, जिनसे बड़ी समस्या से निजात दिलाई जा सकती है, लेकिन न तो हम चेत रहे हैं और न ही जवाबदार चेता रहे हैं। उन्होंने तो लोगों को अपने हालात पर छोड़ दिया है। पक्ष-विपक्ष की लड़ाई में आम आदमी की आवाज दबी-सी महसूस हो रही है। अगर फिर भी न चेते तो मालव माटी गहन गंभीर, पग-पग रोटी डग-डग नीर वाली कहावत इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।
-संजीव मालवीय
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