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बुजुर्ग का चल रहा था अंतिम संस्कार, तभी उफान पर आया नाला; दूसरी जगह बनाई गई चिता फिर भी बह गया अधजला शव

July 04, 2026

धार। विकास के दावों और सरकारी योजनाओं की चमक के बीच आदिवासी अंचल की एक ऐसी दर्दनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने व्यवस्था की संवेदनहीनता को बेनकाब कर दिया है। धार जिले के जामला गांव में एक बुजुर्ग के अंतिम संस्कार के दौरान अचानक उफनाए नाले में जलती चिता बह गई। परिजनों और ग्रामीणों की आंखों के सामने अधजला शव तेज बहाव में बहने लगा।

मजबूर ग्रामीणों ने अपनी जान जोखिम में डालकर शव को बाहर निकाला और दूसरी जगह चिता सजाकर अंतिम संस्कार पूरा किया। यह घटना नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के विधानसभा क्षेत्र की है, जहां वर्षों से विकास के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन आज भी ग्रामीणों को सम्मानजनक अंतिम संस्कार जैसी बुनियादी सुविधा तक नसीब नहीं है।

ग्राम जामला के खाड़ापुरा मोहल्ले के निवासी बुजुर्ग बापूसिंह के निधन के बाद परिजन उन्हें गांव के मुक्तिधाम लेकर पहुंचे। मुखाग्नि दिए जाने के कुछ ही समय बाद पास का पहाड़ी नाला अचानक उफान पर आ गया। देखते ही देखते पानी का तेज बहाव चिता को अपने साथ बहाकर ले गया। परिजन और ग्रामीण स्तब्ध रह गए। गम और बेबसी के बीच कुछ ग्रामीण पानी में उतरे और अधजले शव को बाहर निकालकर सुरक्षित स्थान पर दोबारा चिता तैयार कर अंतिम संस्कार कराया।


  • यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास की वास्तविक तस्वीर है। सवाल यह है कि जिस मुक्तिधाम का निर्माण हुआ, वह आखिर उफनते नाले के किनारे क्यों बनाया गया? क्या निर्माण से पहले सुरक्षा और भौगोलिक परिस्थितियों का आकलन नहीं किया गया? यदि बारिश के मौसम में अंतिम संस्कार तक सुरक्षित नहीं हो सकता, तो ऐसे विकास कार्यों का औचित्य क्या है?

    सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि ग्राम पंचायत के जिम्मेदार प्रतिनिधि इस पूरे मामले से चुप नजर आए। सरपंच प्रतिनिधि कैलाश भंवर ने घटना की विस्तृत जानकारी होने से इनकार करते हुए केवल इतना कहा कि उन्हें गांव में एक बुजुर्ग की मृत्यु की सूचना थी। घटना के बाद ग्रामीणों में गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि जीवित रहते हुए सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है और मृत्यु के बाद भी सम्मानजनक विदाई नसीब नहीं होती।

    ग्रामीणों ने मांग की है कि गांव में बारिश के मौसम को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित स्थान पर स्थायी और सुरक्षित मुक्तिधाम का निर्माण कराया जाए, ताकि भविष्य में किसी परिवार को ऐसी अमानवीय और पीड़ादायक स्थिति का सामना न करना पड़े।आखिर आदिवासी अंचलों में विकास के करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद लोग सम्मानजनक अंतिम संस्कार जैसी मूलभूत सुविधा से भी क्यों वंचित हैं? यह घटना सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को उजागर करती है।

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