
जबलपुर। नेताजी सुभाषचंद्र बोस केंद्रीय कारागार का हाई-सिक्योरिटी फांसी वार्ड इन दिनों एक ऐसे कानूनी इंतजार का प्रतीक बना हुआ है, जहां मौत की सजा सुनाए जा चुके चार दोषी हर दिन अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। निचली अदालतों ने इन्हें रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में मृत्युदंड सुनाया, लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था में उपलब्ध संवैधानिक अधिकारों के तहत दायर अपीलों के कारण फांसी की सजा अब तक अमल में नहीं आ सकी है।
सूत्रों के अनुसार, सेंट्रल जेल में इस समय चार ऐसे बंदी हैं जिन्हें विभिन्न अदालतों ने दुष्कर्म के बाद हत्या और सामूहिक हत्याकांड जैसे जघन्य अपराधों में फांसी की सजा सुनाई है। इनमें से किसी की अपील हाईकोर्ट में लंबित है तो किसी का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। जब तक न्यायिक प्रक्रिया पूरी नहीं होती और अंतिम डेथ वारंट जारी नहीं होता, तब तक इन दोषियों को फांसी नहीं दी जा सकती।जेल परिसर में बना फांसीघर वर्षों से उपयोग की प्रतीक्षा कर रहा है। कानूनी प्रक्रिया, अपील, पुनर्विचार याचिका, क्यूरेटिव पिटीशन और आवश्यकता पडऩे पर दया याचिका जैसी संवैधानिक प्रक्रियाओं के कारण फांसी की सजा पर अमल में लंबा समय लग रहा है। यही कारण है कि सजा सुनाए जाने के बावजूद वर्षों से कोई दोषी फांसी के तख्ते तक नहीं पहुंच पाया।
फांसी वार्ड में हर दिन इंतजार-जेल के भीतर बने इस विशेष वार्ड में रहने वाले चारों दोषियों के लिए हर दिन एक नई प्रतीक्षा लेकर आता है। एक ओर अदालतों में लंबित अपीलें हैं, दूसरी ओर जेल की ऊंची दीवारों के बीच मौत की सजा का इंतजार। न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक यही इंतजार उनकी नियति बना हुआ है।
- पहला मामला: शहडोल जिले के बुढ़ार निवासी विनोद उर्फ राहुल को चार वर्षीय मासूम बच्ची से दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या के मामले में मृत्युदंड सुनाया गया। जिला अदालत के फैसले को हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
- दूसरा मामला: सतना जिले के महेंद्र गोंड ने एक मासूम बच्ची का अपहरण कर जंगल में उसके साथ दुष्कर्म किया और मृत समझकर छोड़ दिया था। निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों ने मृत्युदंड बरकरार रखा।
- तीसरा मामला: मंडला जिले के मनेरी में पारिवारिक विवाद के दौरान हरीश सोनी ने कुल्हाड़ी और तलवार से दो मासूम बच्चों सहित छह लोगों की हत्या कर दी थी। अपर सत्र न्यायालय निवास ने उसे मृत्युदंड सुनाया। यह मामला फिलहाल हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
- चौथा मामला: शहडोल जिले में तीन वर्षीय मासूम से दुष्कर्म के दोषी रामनारायण भानू को पॉक्सो अदालत ने मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर मानते हुए फांसी की सजा सुनाई। आरोपी की अपील फिलहाल हाईकोर्ट में लंबित है।
सबसे कड़ी निगरानी में रहते हैं फांसी के बंदी
जेल सूत्रों के अनुसार, फांसी की सजा पाए बंदियों की निगरानी सामान्य कैदियों की तुलना में कहीं अधिक सख्त होती है। उनकी गतिविधियों पर चौबीसों घंटे नजर रखी जाती है। नियमित अंतराल पर प्रहरी और वरिष्ठ जेल अधिकारी वार्ड का निरीक्षण करते हैं, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।
कानून देता है अंतिम अवसर
भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड पाए प्रत्येक दोषी को उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय, पुनर्विचार याचिका, क्यूरेटिव याचिका और अंत में राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर करने का अधिकार प्राप्त है। जब तक इन सभी कानूनी प्रक्रियाओं का अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक फांसी की सजा पर अमल नहीं किया जा सकता।