
सोनम-सिया कांड के बाद बदला कोर्ट का नजरिया… 12 महीने की बाध्यता नकारते हुए लिया फैसला
इंदौर। हिन्दू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) 1955 में शादी के बाद 18 महीने तक तलाक (divorce) के आवेदन ना लेने का नियम है। वहीं सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कुछ फैसलों में एक साल की समय सीमा तय की थी। हालांकि बाद में कुछ प्रकरणों में इसे बदला भी गया और सोनम-सिया (Sonam-Siya) जैसे चर्चित मामलों के बाद लगता है कोर्ट का नजरिया भी बदला और अभी इंदौर में प्रधान न्यायाधीश कुटुम्ब न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश सुनाया, जिसमें घर वालों की मर्दी से शादी करने वाली लड़की ने पुराने प्रेम-प्रसंग के आधार पर शादी के एक हफ्ते बाद ही तलाक का आवेदन लगा दिया, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया।
इंदौर का सोनम कांड देशभर में सुर्खियों में रहा, उसके बाद सिया प्रकरण भी सामने आया, जिसमें पुराने प्रेम-प्रसंगों के चलते पति की हत्या कर दी गई। इन दिनों वैसे भी तलाक के कई प्रकरण अदालत में लम्बित हैं। अभी इंदौर में फेमिली कोर्ट में एक नजीर पेश करते हुए शादी के हफ्तेभर बाद ही प्रस्तुत विवाह विच्छेद याचिका को मंजूरी दी। इस याचिका को लगाने वाली अभिभाषक वर्षा गुप्ता ने बताया कि धारा 13बी हिन्दू विवाह अधिनियम में नियमानुसार दोनों पक्षों का एक वर्ष तक अलग रहना आपसी सहमति से विवाह विच्छेद की मुख्य शर्त है, लेकिन फेमिली कोर्ट ने इस विशेष प्रकरण में तथ्यों और वस्तुस्थिति को देखते हुए शादी के 7 दिनों में ही प्रस्तुत तलाक की याचिका को मंजूरी दे दी। गांव से जबरदस्ती शादी करके आई पत्नी ने पति के साथ रहने से स्पष्ट इनकार कर दिया और कहा कि यह शादी मेरी मर्जी से नहीं, बल्कि घर वालों के कारण जबरदस्ती की गई है और मैं साथ नहीं रहना चाहती और पूर्व से उसका संबंध भी है। फेमिली कोर्ट में हालांकि पति-पत्नी दोनों ने आपसी सहमति से यह विवाह विच्छेद याचिका प्रस्तुत की, जिस पर प्रथम दृष्ट्या यह सवाल उठा कि क्या धारा 13बी की शर्तों के अनुसार एक वर्ष अलग-अलग रहने की शर्त पूरी नहीं की गई है। अत: यह विवाह विच्छेद याचिका सुनी जाए अथवा नहीं। इस मामले में अधिवक्ता वर्षा गुप्ता ने जोरदार तर्कों के साथ बहस करते हुए धारा 14 (2) हिन्दू विवाह अधिनियम की आवेदन देते हुए कहा गया कि उच्चतम न्यायालय के द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि जिस विवाह का कोई अस्तित्व ही ना हो उसमें दोनों पक्षों को जबरदस्ती नहीं बांध जा सकता। दोनों पक्षों का समय खराब न करते हुए दोनों पक्षों की समझदारी से अलग कर देना ही उचित होगा। उक्त आदेश परिवार न्यायालय के न्यायाधीश डॉ. कुलदीप जैन द्वारा दिया गया।
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