वॉशिंगटन। गाजा में युद्ध खत्म कराने और स्थायी शांति की कोशिशों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के दामाद और उनके करीबी दूत जारेड कुशनर (Donald Trump) ने एक बार फिर कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए हैं। कुशनर ने पहले मिस्र में हमास के प्रतिनिधियों से बातचीत की और इसके बाद इजरायल पहुंचकर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ लंबी बैठक की।
बातचीत में गाजा को डिमिलिटराइज यानी सैन्य गतिविधियों और हथियारों से मुक्त करने को लेकर दोनों पक्षों की स्थिति सामने आई है। हमास हथियार छोड़ने की बात पर तैयार दिख रहा है, लेकिन उसकी शर्त है कि इजरायली सेना भी गाजा से पीछे हटे और हमले पूरी तरह बंद किए जाएं। दूसरी ओर इजरायल का कहना है कि हमास के पूरी तरह हथियार डालने के बाद ही सेना की वापसी संभव होगी।
यही शर्तें दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ी अड़चन बनी हुई हैं।
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मिस्र में कुशनर के साथ बातचीत के दौरान हमास ने गाजा को डिमिलिटराइज करने की अपनी तैयारी दोहराई। हालांकि संगठन ने स्पष्ट किया कि हथियार छोड़ने की प्रक्रिया एकतरफा नहीं हो सकती।
हमास चाहता है कि इजरायली सेना पहले उस स्थिति तक वापस जाए, जिसे बातचीत में ‘येलो लाइन’ कहा जा रहा है। इसके बाद युद्ध पूरी तरह रोकने, इजरायली सैनिकों की गाजा से वापसी, मानवीय सहायता बढ़ाने और फिर पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई है।
हमास का तर्क है कि यदि इजरायली सेना गाजा में मौजूद रहेगी और हमले जारी रहने की आशंका बनी रहेगी, तो वह अपनी सैन्य क्षमता खत्म करने के लिए तैयार क्यों होगा।
दूसरी ओर अमेरिकी पक्ष हमास से सिर्फ मौखिक आश्वासन नहीं चाहता। कुशनर ने कथित तौर पर संगठन से हथियार छोड़ने और उसके सैन्य ढांचे को खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की।
हमास ने हथियार छोड़ने की इच्छा जताई है, लेकिन उसका कहना है कि यह किसी एक दिन में होने वाली कार्रवाई नहीं होगी। इसके लिए इजरायल को भी समानांतर कदम उठाने होंगे।
यहीं से सवाल उठता है कि अगर अमेरिका हमास से अपने वादे को जमीन पर उतारने के लिए ठोस कार्रवाई की मांग कर रहा है, तो क्या ट्रंप प्रशासन इजरायल पर भी इसी तरह का दबाव बनाएगा?
मिस्र में हमास से बातचीत के बाद कुशनर इजरायल पहुंचे, जहां उनकी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ कई घंटे बैठक हुई।
बैठक में अमेरिका के इजरायल में राजदूत माइक हकाबी और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर भी शामिल हुए।
इजरायली अधिकारियों के मुताबिक, बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि गाजा के डिमिलिटराइजेशन की शुरुआत हमास के हथियार सौंपने से होनी चाहिए। हथियारों को जमा करने की प्रक्रिया की निगरानी एक अमेरिकी सैन्य जनरल के नेतृत्व में कराने का प्रस्ताव भी सामने आया है।
इसका मतलब यह होगा कि सिर्फ हथियार जमा करने का दावा पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि हमास की सैन्य क्षमता वास्तव में खत्म की जा रही है।
बैठक के बाद गाजा से जुड़े मुद्दों के लिए दो संयुक्त कार्य समूह बनाने की योजना भी सामने आई है।
पहला समूह गाजा के डिमिलिटराइजेशन और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर काम करेगा। वहीं दूसरा समूह गाजा के आम लोगों की बुनियादी जरूरतों पर ध्यान देगा।
इसमें साफ पानी, स्वच्छता, मानवीय सहायता और दूसरी जरूरी सुविधाओं को बहाल करने जैसे मुद्दे शामिल होंगे।
पूरे प्रयास में सबसे बड़ी चुनौती इजरायली सेना की वापसी को लेकर है। नेतन्याहू की स्थिति अब भी यही बताई जा रही है कि जब तक हमास पूरी तरह हथियार नहीं छोड़ता, तब तक IDF गाजा से पीछे नहीं हटेगी।
इजरायल चाहता है कि पहले हमास की सैन्य क्षमता खत्म हो, उसके बाद इजरायली सेना की वापसी और बड़े स्तर पर पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो।
हालांकि नेतन्याहू के कार्यालय ने बैठक में हुई सभी बातों की आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं की है।
पूरे विवाद को आसान भाषा में समझें तो दोनों पक्षों की शुरुआती शर्तें एक-दूसरे के बिल्कुल उलट हैं।
हमास की मांग:
पहले इजरायली सेना पीछे हटे, हमले रुकें, मानवीय सहायता बढ़े और उसके बाद हथियार छोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़े।
इजरायल की मांग:
पहले हमास हथियार पूरी तरह सौंपे और अपनी सैन्य क्षमता खत्म करे, इसके बाद सेना की वापसी और बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण शुरू होगा।
यही ‘पहले कौन कदम उठाए’ वाला सवाल गाजा शांति प्रक्रिया का सबसे मुश्किल हिस्सा बना हुआ है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के प्रस्तावित शांति प्लान में भी गाजा के डिमिलिटराइजेशन और पुनर्निर्माण को प्राथमिकता दी गई है। योजना में हथियार छोड़ने और इजरायली सेना की वापसी की प्रक्रिया को क्रमिक तरीके से आगे बढ़ाने की बात रही है।
लेकिन व्यवहार में समस्या तब पैदा हुई जब इजरायल ने पहले हमास के पूरी तरह हथियार डालने पर जोर दिया, जबकि हमास समानांतर प्रक्रिया चाहता है—यानी उसके हथियार कम हों तो इजरायली सेना भी उसी अनुपात में पीछे हटे।
अब कुशनर की कूटनीति की असली परीक्षा यही है कि वह हमास से ठोस कार्रवाई कराने के साथ इजरायल और नेतन्याहू को भी समझौते के अगले चरणों के लिए कितना तैयार कर पाते हैं।
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