नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन (Climate change) का असर अब सिर्फ बढ़ते तापमान और बदलते मौसम (Temperature and Changing Weather) तक सीमित नहीं है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर (Rising sea levels) आने वाले दशकों में दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। वैज्ञानिक आकलनों के मुताबिक, अगर वैश्विक तापमान और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ तो वर्ष 2100 तक समुद्र का जलस्तर 1 मीटर से अधिक बढ़ सकता है। गंभीर परिस्थितियों में करीब 2 मीटर तक की वृद्धि का खतरा भी जताया गया है, जिससे दुनिया के बड़े तटीय इलाकों में बाढ़ का जोखिम बेहद बढ़ जाएगा।
2100 तक कितना बढ़ सकता है समुद्र का जलस्तर?
समुद्र के जलस्तर में वृद्धि पहले ही दर्ज की जा रही है। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच वैश्विक समुद्र स्तर औसतन करीब 4.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से बढ़ा। वर्ष 2024 में यह दर बढ़कर करीब 5.9 मिलीमीटर दर्ज की गई।
वैज्ञानिक अनुमानों के मुताबिक सबसे अनुकूल जलवायु परिदृश्य में भी वर्ष 2100 तक समुद्र का औसत जलस्तर करीब 0.55 मीटर बढ़ सकता है। वहीं अधिक गंभीर उत्सर्जन और तापमान वृद्धि की स्थिति में यह वृद्धि 1 मीटर से ज्यादा हो सकती है।
आखिर समुद्र का पानी लगातार क्यों बढ़ रहा है?
इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं।
पहला कारण है वैश्विक तापमान में वृद्धि। धरती के गर्म होने से ध्रुवीय बर्फ की चादरें और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे बड़ी मात्रा में पानी समुद्र में पहुंच रहा है।
दूसरा कारण समुद्र के पानी का गर्म होने पर फैलना है। महासागर मानव गतिविधियों से पैदा होने वाली अतिरिक्त गर्मी का करीब 91 फीसदी हिस्सा सोख रहे हैं। तापमान बढ़ने के साथ समुद्री पानी फैलता है और इससे समुद्र का स्तर ऊपर जाता है।
77 करोड़ लोगों पर सीधा खतरा
समुद्र के बढ़ते जलस्तर का सबसे बड़ा असर तटीय इलाकों में रहने वाली आबादी पर पड़ेगा। दुनिया की करीब 10 फीसदी आबादी यानी लगभग 77 करोड़ लोग समुद्र तल से 5 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रहते हैं।
समुद्र का स्तर बढ़ने के साथ इन इलाकों में सिर्फ बाढ़ का खतरा नहीं बढ़ेगा, बल्कि तटीय कटाव और खारे पानी के जमीन के भीतर पहुंचने की समस्या भी गंभीर हो सकती है। समुद्री पानी के कारण कृषि भूमि की उर्वरता प्रभावित होने के साथ मीठे पानी के स्रोतों के दूषित होने का खतरा भी बढ़ता है।
2 मीटर पानी में डूब जाएगी पूरी दुनिया?
‘पूरी दुनिया 2 मीटर पानी में डूब जाएगी’ कहना वैज्ञानिक अनुमान को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना होगा। समुद्र का स्तर औसतन 2 मीटर बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि पृथ्वी का हर इलाका पानी में समा जाएगा।
लेकिन यदि समुद्र का स्तर लंबे समय में बेहद गंभीर परिस्थितियों में करीब 2 मीटर तक बढ़ता है, तो निचले तटीय इलाकों, छोटे द्वीपों और कई तटीय शहरों के लिए इसका असर बेहद विनाशकारी हो सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों की चिंता पूरी पृथ्वी के डूबने से ज्यादा उन आबादी वाले क्षेत्रों को लेकर है, जो समुद्र के बेहद करीब और कम ऊंचाई पर स्थित हैं।
अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान
समुद्र का बढ़ता स्तर पर्यावरणीय संकट के साथ आर्थिक संकट भी पैदा कर सकता है। तटीय इलाकों में मौजूद बंदरगाह, सड़कें, रेलवे, उद्योग, आवासीय क्षेत्र और दूसरी बुनियादी सुविधाएं बाढ़ और तटीय कटाव की चपेट में आ सकती हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक तटीय बुनियादी ढांचे को अब तक 1.8 खरब डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष नुकसान हो चुका है। अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समुद्री आपदाओं के कारण दुनिया को हर साल करीब 1.4 खरब डॉलर तक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
छोटे द्वीपीय देशों के लिए सबसे बड़ा संकट
समुद्र के बढ़ते जलस्तर का खतरा छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के लिए और गंभीर है। इनमें कई देश समुद्र तल से बहुत कम ऊंचाई पर स्थित हैं। इनके लिए समुद्र का बढ़ना जमीन के नुकसान के साथ-साथ पेयजल, खेती और बस्तियों के अस्तित्व का सवाल भी बन सकता है।
आंकड़ों के मुताबिक 1970 से 2020 के बीच छोटे द्वीपीय विकासशील देशों को जलवायु संबंधी आपदाओं से करीब 153 अरब डॉलर का नुकसान हुआ।
अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
समुद्र का जलस्तर बढ़ने की प्रक्रिया को तुरंत रोकना आसान नहीं है। इसलिए वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के सामने दोहरी चुनौती है—ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना और उन तटीय क्षेत्रों को भविष्य के बढ़ते जलस्तर के लिए तैयार करना जहां करोड़ों लोग रहते हैं।
यानी संकट सिर्फ यह नहीं है कि वर्ष 2100 में समुद्र कितना ऊपर उठेगा। असली सवाल यह है कि दुनिया आज से कितनी तैयारी करती है। अगर उत्सर्जन पर नियंत्रण और तटीय इलाकों की सुरक्षा के उपाय समय पर नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए समुद्र का बढ़ता जलस्तर एक बेहद महंगा और गंभीर संकट बन सकता है।
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