नई दिल्ली। यमन के हूती विद्रोहियों (Yemen’s Houthi rebels) की सैन्य ताकत पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक हूती लड़ाकों (Houthi fighters) की संख्या 2015 में करीब 30 हजार थी, जो 2022 में लगभग 2.2 लाख और 2024 में बढ़कर करीब 3.5 लाख हो गई। हालांकि, यह संख्या पूरी तरह सत्यापित स्थायी सेना की संख्या नहीं मानी जा सकती। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने भी नई भर्ती के आंकड़े को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया था।
इसलिए 30 हजार से 3.5 लाख की वृद्धि को केवल सीधी भर्ती की कहानी के तौर पर देखना सही नहीं होगा। इसमें नियमित लड़ाके, स्थानीय और कबायली समर्थक, रिजर्व बल तथा व्यापक सैन्य लामबंदी नेटवर्क शामिल हो सकते हैं। विश्लेषणों में हूतियों की इस ताकत के पीछे यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण, वर्षों से जारी युद्ध, स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क, वैचारिक लामबंदी, गाजा युद्ध के बाद शुरू हुए भर्ती अभियान और ईरान से मिली सैन्य सहायता जैसे कई कारण गिनाए गए हैं।
हूती आंदोलन ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और उत्तर-पश्चिमी यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। इसके बाद उसके नियंत्रण वाले इलाकों में प्रशासन, स्थानीय संस्थाओं और सामाजिक नेटवर्क पर उसकी पकड़ मजबूत होती गई। यही व्यवस्था आगे चलकर युवाओं तक पहुंच और सैन्य लामबंदी का आधार बनी।
यमन में लंबे समय से जारी राजनीतिक और सैन्य संघर्ष ने भी हूतियों को अपने प्रभाव क्षेत्र में लगातार लोगों को संगठित करने का अवसर दिया। युद्ध के दौरान संगठन ने खुद को विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ लड़ने वाले आंदोलन के रूप में पेश किया।
2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में सैन्य हस्तक्षेप शुरू होने के बाद हूतियों ने हवाई हमलों और सैन्य कार्रवाई को विदेशी आक्रमण के रूप में प्रचारित किया। लंबे समय तक चले संघर्ष ने संगठन को अपने समर्थकों को लामबंद करने के लिए एक मजबूत नैरेटिव दिया।
2025 में अमेरिका और हूतियों के बीच संघर्ष विराम के बाद भी संगठन ने अपने सैन्य ढांचे को पुनर्गठित करने और भर्ती बढ़ाने पर ध्यान दिया। मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका के खिलाफ ‘प्रतिरोध में जीत’ की कहानी का इस्तेमाल आंतरिक लामबंदी और भर्ती को बढ़ावा देने के लिए किया गया।
अक्टूबर 2023 में इजरायल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद हूतियों ने अपने अभियान को फिलिस्तीन और गाजा के समर्थन से जोड़ दिया। इसी दौर में संगठन ने ‘अल-अक्सा फ्लड’ नाम से सैन्य प्रशिक्षण और भर्ती अभियान चलाया।
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट ने संयुक्त राष्ट्र के आकलन का हवाला देते हुए बताया कि हूती लड़ाकों की संख्या 2022 के करीब 2.2 लाख से बढ़कर 2024 में 3.5 लाख हुई। इस वृद्धि को ‘अल-अक्सा फ्लड’ भर्ती अभियान और गाजा युद्ध से बने भावनात्मक एवं राजनीतिक माहौल से जोड़ा गया है।
यमन सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज की रिपोर्ट के मुताबिक इन प्रशिक्षण अभियानों में कबायली नेताओं और स्थानीय समुदायों की भी भूमिका रही। शुरुआती दौर में हजारों लोगों ने ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।
हूतियों की बढ़ती सैन्य ताकत में केवल स्वैच्छिक भर्ती ही शामिल नहीं है। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने बच्चों की भर्ती और विदेशी प्रवासियों को जबरन शामिल किए जाने संबंधी सूचनाओं का भी उल्लेख किया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया कि नवंबर 2023 के बाद कई हजार लोगों, जिनमें बच्चे भी शामिल थे, को हूती बलों में भर्ती किए जाने की जानकारी मिली थी। हालांकि, विशेषज्ञों ने 3.5 लाख की कुल संख्या में नई भर्ती के आंकड़े को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया था।
विश्लेषकों के मुताबिक इसी वजह से 3.5 लाख के आंकड़े को हूतियों की व्यापक सैन्यीकृत व्यवस्था के रूप में देखना अधिक उचित है, न कि हर व्यक्ति को समान रूप से सक्रिय मोर्चे पर तैनात नियमित सैनिक मानना।
हूतियों की ताकत बढ़ने में ईरान की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों और अन्य विश्लेषणों के मुताबिक ईरान तथा क्षेत्र के अन्य सहयोगियों से हूतियों को हथियार, प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और खुफिया सहयोग मिला है। इससे संगठन की मिसाइल और ड्रोन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के अनुसार ईरान से मिसाइल और ड्रोन प्रणालियों से जुड़े कल-पुर्जे तथा तकनीकी सहायता मिलने की जानकारी है। हूती इन प्रणालियों के कुछ हिस्सों को यमन में असेंबल करते हैं।
हालांकि, ईरानी मदद को मुख्यतः हूतियों की मारक क्षमता बढ़ाने से जोड़कर देखा जाता है। बड़ी संख्या में लड़ाकों की लामबंदी के पीछे स्थानीय सत्ता, आर्थिक नियंत्रण, सामाजिक नेटवर्क, वैचारिक प्रचार और वर्षों से चला आ रहा युद्ध भी महत्वपूर्ण कारक हैं। इसलिए हूतियों को केवल ईरान नियंत्रित संगठन के रूप में देखना यमन की स्थानीय राजनीति की पूरी तस्वीर नहीं बताता।
हूतियों के विरोध में खड़े यमन के सरकार समर्थक बल, दक्षिणी अलगाववादी और विभिन्न कबायली एवं मिलिशिया गुट लंबे समय तक एकजुट नहीं रहे। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के समर्थन वाले गुटों के अपने-अपने हित रहे हैं। दक्षिण यमन में अलगाववाद और राष्ट्रीय एकता को लेकर भी मतभेद रहे हैं।
इस बिखराव ने हूतियों को अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सैन्य ढांचा मजबूत करने और नए लोगों को लामबंद करने का अवसर दिया। हालिया विश्लेषणों में भी सरकार समर्थक खेमे की असंगति को हूतियों की ताकत बढ़ने का एक कारण बताया गया है।
इस तरह हूतियों की मौजूदा ताकत को केवल बड़े पैमाने पर अचानक हुई भर्ती से समझना मुश्किल है। सना और उत्तर-पश्चिमी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण, वर्षों का युद्ध, सऊदी और पश्चिमी हस्तक्षेप के खिलाफ प्रतिरोध का नैरेटिव, गाजा युद्ध के बाद ‘अल-अक्सा फ्लड’ अभियान, स्थानीय सैन्य प्रशिक्षण, कथित जबरन भर्ती और ईरान से मिली सैन्य-तकनीकी मदद ने मिलकर हूतियों को एक बड़े सैन्य नेटवर्क में बदलने में भूमिका निभाई है।
इसमें 3.5 लाख का आंकड़ा एक महत्वपूर्ण अनुमान है, लेकिन इसे पूरी तरह सत्यापित सक्रिय स्थायी सेना की संख्या मानना उचित नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने स्वयं नई भर्ती के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होने की बात कही थी।
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