
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल (West Bengal) का नाम बदलकर (Name Changing) ‘पश्चिम बंग’ करने की कवायद एक बार फिर तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य (BJP President Samik Bhattacharya) ने सोमवार को कहा कि राज्य सरकार जल्द ही विधानसभा में नाम परिवर्तन से जुड़ा विधेयक पेश करेगी। उन्होंने संकेत दिया कि बिल अगले विधानसभा सत्र में लाया जा सकता है।
समिक भट्टाचार्य ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राज्य के नाम को उसकी ऐतिहासिक पहचान से जोड़ने के लिए ‘पश्चिम बंग’ नाम प्रस्तावित किया जा रहा है। उनके मुताबिक अब ‘बंगाल’, ‘बांग्ला’ या ‘वेस्ट बंगाल’ के बजाय राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ रखने की दिशा में सरकार आगे बढ़ेगी। हालांकि, विधानसभा से विधेयक पारित होने और आगे की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने तक राज्य का आधिकारिक नाम पश्चिम बंगाल ही रहेगा।
वाराणसी में बनेगा ‘पश्चिम बंग भवन’
समिक भट्टाचार्य ने वाराणसी में ‘पश्चिम बंग भवन’ बनाए जाने की योजना की भी जानकारी दी। उनके अनुसार इस परियोजना में राज्य का संस्कृति एवं पर्यटन विभाग, केंद्र सरकार और कूचबिहार के पूर्व राजपरिवार के वंशज सहयोग करेंगे।
प्रस्तावित भवन को केवल ठहरने की जगह के तौर पर नहीं, बल्कि बंगाल की संस्कृति और विरासत से जुड़े सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। इसमें सम्मेलन कक्ष, पुस्तकालय और बंगाली साहित्य एवं गीतों से जुड़ा संग्रह रखने की बात कही गई है। साथ ही बंगाल से वाराणसी आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए ठहरने की सुविधा भी उपलब्ध कराने की योजना है।
काशी से बंगाल का पुराना सांस्कृतिक रिश्ता
भाजपा नेता ने वाराणसी और बंगाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि काशी में बंगाली समुदाय की लंबे समय से मौजूदगी रही है और बंगाल से आने वाले लोगों का शहर से गहरा जुड़ाव रहा है।
उन्होंने कूचबिहार के राजपरिवार का उदाहरण देते हुए कहा कि राजपरिवार ने 1836 में बनारस कालीबाड़ी की आधारशिला रखी थी और इसके करीब एक दशक बाद वहां दो मंदिरों का निर्माण कराया गया था।
1999 में पहली बार विधानसभा में आया था प्रस्ताव
पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की चर्चा नई नहीं है। वर्ष 1999 में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने विधानसभा में ‘पश्चिम बंग’ नाम रखने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद ‘बांग्ला’ नाम को लेकर भी चर्चा हुई और प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया। हालांकि राजनीतिक सहमति और केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
2011 में ममता सरकार ने फिर उठाया मुद्दा
2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद नाम बदलने का मुद्दा दोबारा सामने आया। ममता बनर्जी सरकार ने भी ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव रखा था। उस समय यह तर्क दिया गया था कि अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में ‘West Bengal’ नाम नीचे होने के कारण राष्ट्रीय स्तर की बैठकों में राज्य के प्रतिनिधियों को अपनी बारी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। 2011 में सर्वदलीय बैठक में इस प्रस्ताव को समर्थन मिला, लेकिन केंद्र सरकार की मंजूरी नहीं मिल सकी।
2016 में तीन नामों का प्रस्ताव, 2018 में ‘बांग्ला’ पर मुहर
नाम बदलने की प्रक्रिया 2016 में फिर शुरू हुई। उस समय बंगाली में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘बंगाल’ और हिंदी में ‘बंगाल’ नाम रखने का प्रस्ताव सामने आया। इसके बाद 2018 में पश्चिम बंगाल विधानसभा ने राज्य का नाम सभी भाषाओं में ‘बांग्ला’ रखने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया।
लेकिन केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। केंद्र की ओर से कहा गया कि राज्य का नाम बदलने के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी। गृह मंत्रालय ने 2020 में राज्य का नाम ‘Bangla’ करने के प्रस्ताव के संबंध में राज्यसभा में बताया था कि किसी राज्य का नाम बदलने के लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत होती है।
अब फिर ‘पश्चिम बंग’ पर जोर
अब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने ‘पश्चिम बंग’ नाम को लेकर नए सिरे से विधेयक लाने की बात कही है। उन्होंने इसे राज्य की इतिहास और पहचान से जोड़ने वाला नाम बताया है। हालांकि यह अभी राजनीतिक घोषणा और प्रस्ताव के स्तर पर है।
राज्य का आधिकारिक नाम बदलने के लिए विधानसभा में विधेयक पारित होने के बाद केंद्र की संवैधानिक प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। इसलिए फिलहाल पश्चिम बंगाल का नाम आधिकारिक रूप से बदला नहीं है; आगे की प्रक्रिया विधानसभा और केंद्र की मंजूरी पर निर्भर करेगी।
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