
जबलपुर। बढ़ती कृषि लागत, गिरते भूजल स्तर और मौसम की अनिश्चितता के बीच किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से नाबार्ड जबलपुर और कृषि विज्ञान केंद्र, आधारताल के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। कृषि विस्तार एवं प्रशिक्षण केंद्र, आधारताल में हुई कार्यशाला में प्राकृतिक खेती के 3:4:5:88 मॉडल के जरिए खेती की लागत कम करने, जल संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने पर जोर दिया गया।
कार्यशाला के मुख्य अतिथि विज्ञान भारती के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संत प्रसाद गौतम रहे। अध्यक्षता कृषि वैज्ञानिक डॉ. के.एस. नेताम ने की। इस अवसर पर नाबार्ड की जिला विकास प्रबंधक देविना मेहरोत्रा, उप संचालक कृषि डॉ. प्रीति खरे, जय भारती शिक्षा केंद्र के रीजनल कॉर्डिनेटर डॉ. के. शुक्ला और आरकॉनएफ नागपुर के प्रतिनिधि सहित जिलेभर से कृषि सखियां एवं बीआरसी सदस्य उपस्थित रहे। मुख्य प्रशिक्षक भारत लाल नामदेव ने बताया कि 3:4:5:88 मॉडल राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की अवधारणा के अनुरूप है। इसमें किसान अपनी भूमि का 3 प्रतिशत हिस्सा गोपालन एवं खाद निर्माण, 4 प्रतिशत जल बैंक, 5 प्रतिशत उद्यानिकी और 88 प्रतिशत हिस्सा बहुफसलीय मिश्रित खेती के लिए उपयोग करता है।
उन्होंने बताया कि 3 प्रतिशत क्षेत्र में देशी गोवंश के पालन के साथ जीवामृत, घनजीवामृत और फसल अवशेष से खाद तैयार की जा सकती है। चार प्रतिशत क्षेत्र में जल संरचना बनाकर बारिश के पानी का संचयन और भूजल पुनर्भरण किया जाएगा। वहीं पांच प्रतिशत क्षेत्र में नींबू, अमरूद, अनार, सहजन, आम और पपीता जैसे फलदार पौधे लगाकर अतिरिक्त आय का स्रोत विकसित किया जा सकता है।
शेष 88 प्रतिशत क्षेत्र में अनाज के साथ दलहन, तिलहन और सब्जियों की मिश्रित खेती कर मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने पर जोर दिया गया। कार्यशाला के अंत में कृषि सखियों और बीआरसी सदस्यों को छोटे एवं सीमांत किसानों तक प्राकृतिक खेती के इस चक्रीय मॉडल को पहुंचाने का संकल्प दिलाया गया।