
जबलपुर। शहर में होर्डिंग माफिया का बोलबाला इस कदर बढ़ चुका है कि नगर निगम का पूरा प्रशासनिक अमला उनके आगे बेबस नजर आ रहा है। विज्ञापनों से लाखों-करोड़ों का मुनाफा कमाने वाली एजेंसियां न तो निगम को तय किराया और टैक्स दे रही हैं और न ही बुनियादी व्यवस्थाएं संभाल रही हैं। सबसे हैरान करने वाला मामला बंद पड़े सामुदायिक शौचालयों से जुड़ा सामने आया है, जहाँ विज्ञापनों की कमाई तो जारी है, लेकिन रख-रखाव के नाम पर 11 साल पुराने अनुबंध का पेंच फंसाकर पल्ला झाड़ लिया गया है।
कागजी शर्तों की आड़ में बड़ा खेल
मामले की परतों से खुलासा हुआ है कि होर्डिंग एजेंसियों ने अधिकारियों के साथ साठगांठ करके अनुबंध में शौचालय मेंटेनेंस के लिए तीसरी एजेंसी नियुक्त करने की एक विशेष शर्त जुड़वा ली थी। 11 साल से दबाई फाइलें: वर्ष 2014 से 2026 के बीच इस शर्त पर अमल ही नहीं किया गया। फाइलें विभाग में धूल फांकती रहीं और माफिया विज्ञापन का सारा पैसा डकारते रहे। 4 करोड़ से ज्यादा का नुकसान: शहर के 25 शौचालयों की साफ-सफाई, टूट-फूट और चौकीदार पर यदि हर महीने महज 15,000 रुपये का खर्च भी माना जाए, तो 132 महीनों में यह राशि करीब 4 करोड़ रुपये बैठती है।
यूनिपोल से लेकर कचरा स्पॉट तक हर तरफ कब्जा
होर्डिंग माफिया का यह जाल सिर्फ शौचालयों तक सीमित नहीं है:सड़कों और चौराहों पर अवैध होर्डिंग्स: प्रमुख मार्गों पर लगे यूनिपोल और दिशा-सूचक बोर्डों पर धड़ल्ले से विज्ञापन फ्लैक्स टांगे जा रहे हैं।स्वच्छता स्थलों का दुरुपयोग: स्वच्छता रैंकिंग के तहत बनाए गए कचरा एकत्रीकरण स्थलों को भी कमाई का जरिया बना लिया गया है।अधिकारियों की चुप्पी: होर्डिंग विभाग के जिम्मेदार अधिकारी माफिया पर शिकंजा कसना तो दूर, अपने बकाये की वसूली तक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों के निर्देश भी बेअसर
हाल ही में नौदराब्रिज, सिविक सेंटर और शास्त्रीब्रिज स्थित बदहाल शौचालयों का औचक निरीक्षण कर महापौर ने 24 घंटे के भीतर व्यवस्थाएं सुधारने की चेतावनी दी थी। हालांकि, निरीक्षण के कई दिनों बाद भी धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है, जो यह दर्शाती है कि नगर निगम प्रशासन माफिया के रसूख के आगे पूरी तरह नतमस्तक हो चुका है।
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