
जबलपुर। शहर में नगर निगम की आय बढ़ाने के लिए नियम-कायदे तो बनाए गए, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने में जिम्मेदार अधिकारी नाकाम नजर आ रहे हैं। 2017 में लागू किए गए आउटडोर मीडिया रूल्स (ओएमडी) और होर्डिंग संबंधी प्रावधानों के बावजूद शहर में सैकड़ों विज्ञापन बोर्ड बिना पंजीयन लगे होने की बात सामने आई है। इन बोर्डों से नियमानुसार राजस्व वसूली नहीं होने के कारण नगर निगम को लंबे समय से संभावित आय का नुकसान हो रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब 2017 में ही विज्ञापन बोर्डों के लिए नियम और पंजीयन की व्यवस्था तय कर दी गई थी, तो नौ साल बाद भी नगर निगम का होर्डिंग विभाग इन नियमों को प्रभावी ढंग से लागू क्यों नहीं कर पाया?
सड़क घेर रहे विज्ञापन बोर्ड, जिम्मेदारों की नजर क्यों नहीं?
शहर की कई व्यावसायिक दुकानों और संस्थानों के सामने बड़े-बड़े विज्ञापन बोर्ड मुख्य सड़क की ओर लगाए गए हैं। कई जगह ये बोर्ड सड़क और फुटपाथ की जगह तक घेरते नजर आते हैं। इससे पैदल चलने वालों और वाहन चालकों के लिए परेशानी पैदा होने के साथ यातायात प्रभावित होने की स्थिति भी बनती है। नियमों के तहत ऐसे बोर्डों के आकार, स्थान और पंजीयन को लेकर प्रावधान किए गए थे। इसके बावजूद बड़ी संख्या में बोर्डों पर कार्रवाई नहीं होने से निगम की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
बड़े-बड़े बोर्ड लगे, लेकिन निगम का राजस्व कहां?
नगर निगम सीमा में बड़ी संख्या में व्यावसायिक प्रतिष्ठान हैं। कई प्रतिष्ठानों के सामने बड़े विज्ञापन बोर्ड लगे हुए हैं। नियमों के तहत इनसे विज्ञापन संबंधी शुल्क अथवा निर्धारित राजस्व वसूली की व्यवस्था होने के बावजूद वसूली को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यानी एक तरफ नगर निगम राजस्व बढ़ाने के लिए नए-नए स्रोत तलाश रहा है, दूसरी तरफ आंखों के सामने मौजूद विज्ञापन बोर्डों से मिलने वाला संभावित राजस्व ही वसूल नहीं हो पा रहा।
आम आदमी से सख्ती, बड़े विज्ञापन बोर्डों पर नरमी?
नगर निगम द्वारा संपत्ति कर, जलकर और अन्य करों की वसूली के लिए कार्रवाई की जाती है। बकायेदारों के खिलाफ नोटिस से लेकर कुर्की तक की कार्रवाई की खबरें सामने आती रहती हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के सामने नियमों के विपरीत लगे विज्ञापन बोर्डों पर उसी स्तर की सख्ती क्यों नहीं दिखाई देती?
ओएमडी नियम का उद्देश्य भी सवालों में
आउटडोर मीडिया से जुड़े नियमों का उद्देश्य केवल राजस्व वसूली नहीं, बल्कि शहर में विज्ञापन बोर्डों को व्यवस्थित करना और सड़क सुरक्षा व सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल को नियंत्रित करना भी है। बड़े या गलत स्थान पर लगाए गए बोर्ड वाहन चालकों का ध्यान भटका सकते हैं और यातायात व्यवस्था प्रभावित कर सकते हैं। इसके बावजूद यदि बिना पंजीयन और निर्धारित मानकों के बोर्ड लगातार लगे हैं, तो यह नगर निगम के संबंधित विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
2017 में तय था पंजीयन, फिर नौ साल में कितने बोर्ड रजिस्टर्ड हुए?
नगर निगम द्वारा वर्ष 2017 में दुकानों और व्यावसायिक संस्थानों के सामने लगाए जाने वाले बोर्डों के लिए नियम निर्धारित किए गए थे। इनमें बोर्ड की ऊंचाई और लंबाई को लेकर प्रावधान के साथ पंजीयन अनिवार्य किए जाने की बात थी। अब सवाल यह है कि नौ साल के दौरान नगर निगम ने कितने बोर्डों का पंजीयन किया और कितने बिना अनुमति संचालित पाए गए? यदि पंजीयन अनिवार्य था तो बिना पंजीयन वाले बोर्डों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
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