भोपाल न्यूज़ (Bhopal News)

बसपा को उम्मीद उपचुनाव से प्रदेश में बन सकती है तीसरी शक्ति

  • सभी 27 सीटों से चुनाव लडऩे की तैयारी में जुटी है पार्टी

भोपाल। मप्र में बसपा एक बार फिर से अपना पैर मजबूत करने में जुटी हुई है। पार्टी को उम्मीद है कि उपचुनाव में वह तीसरी शक्ति के रूप में सामने आएगी। दरअसल मप्र की सीमाएं भी राजस्थान की तरह उप्र से लगी हुई हैं, जिसकी वजह से सीमाओं वाले जिलों में बसपा का प्रभाव बना रहता है। बसपा के गठन के बाद से उप्र के अलावा किसी अन्य राज्य में बसपा प्रभावशाली दिखी है तो वह राज्य मप्र ही है। एक बार तो मप्र में बसपा विधायकों की संख्या को देखते हुए लगने लगा था, कि यह दल तीसरी शक्ति बन शक्ति है। हालांकि अभी प्रदेश में बसपा के महज दो ही विधायक हैं और वह भाजपा सरकार के साथ बने हुए हैं।
मप्र में पहली बार एक साथ 27 सीटों पर उपचुनाव होना है। माना तो यह भी जा रही है कि उपचुनाव घोषित होने तक ऐसी सीटों की संख्या तीस तक हो सकती है। इसमें भी खास बात यह है कि इनमें से जिन अधिकांश सीटों पर होना है, वह ग्वालियर चंबल अंचल के तहत बसपा के प्रभाव वाले इलाके की हैं। इसके चलते बसपा की उम्मीदें भी बड़ी हुई हैं। यही वजह है कि भाजपा व कांग्रेस के साथ ही बसपा भी उपचुनाव की तैयारी मेें लगी हुई है। पार्टी इस चुनाव में पूरी तरह से जीत की संभावना वाले प्रत्याशियों की खोज में है। पार्टी द्वारा अन सीटों पर प्रत्याशियों की तलाश में एक दौर का सर्वे तक कराया जा चुका है। इसके अलावा पार्टी उन नेताओं पर भी नजर बनाए हुए हैं जो दूसरे दलों से नाराज होकर पार्टी में आकर प्रत्याशी बनने के बाद जीत दर्ज कर सकते हैं। यही वजह है कि पार्टी ने ऐसे लोगों के लिए पूर्व की तरह अपने दरवाजे खोल रखे हैं।

विधायकों पर नजर
बसपा सुप्रीमों राजस्थान में मिले झटके के बाद द्वारा मप्र के अपने दोनों विधायकों पर नजर बनी हुई है। यह दोनों ही विधायक पहले कमलनाथ और अब भाजपा की शिव सरकार के साथ गलबहियां जारी है। माना जा रहा है कि यह विधायक कभी भी विशेष परिस्थिी बनी तो पार्टी को अलविदा कह सकते हैं। यही वजह है कि पार्टी उपचुनाव जीतकर इनकी राह का रोड़ा तैयार करने के प्रयास में है। मप्र में एक समय बसपा का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था, लेकिन बसपा सुप्रीमों व उसवके रणनीतिकारों ने पार्टी को मजबूती देने वालों को कभी आगे नहीं बढऩेे दिया है। यही वजह कि पार्टी के कई ऊर्जावान व संगठन को मजबूत करने वालें नेताओं को मौका मिलते ही बाहर का रास्ता दिखाया जाता रहा है। फलस्वरुप पार्टी कमजोर होती गई और इस स्थिति में आकर खड़ी हो गई। अब उप्र में भी पार्टी की हालत पतली है, सो अब मप्र पर उसका ध्यान देना मजबूरी बन गई है।

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