ब्‍लॉगर

कोरोना की छाया में विश्व शांति की तलाश

अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक शांति दिवस 21 सितंबर पर विशेष

– डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

इस साल 21 सितंबर को दुनिया के देश कोरोना की छाया में अंतरराष्ट्रीय वैश्विक शांति दिवस मना रहे हैं। वैश्विक शांति के सामने अब हिंसा प्रदर्शन के साथ कोरोना महामारी से नई परिस्थितियां आ गई है। कोरोना के कारण दुनिया के देशों के हालात विकट हैं तो इसके कारण जनजीवन थम जाने से स्थितियां और भी मुश्किल भरी हो गई है। कोरोना महामारी केवल मौत का तांडव लेकर नहीं आई अपितु इसने सबकुछ बदल कर रख दिया। कोरोना के कारण आर्थिक संकट का दौर आ गया है, उद्योग-धंधे बंद हुए तो नागरिकों के रोजगार छिने हैं और वेतन-भत्तों में कटौती आम है। इससे दुनिया के देशों की सरकारों को एक साथ कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ रहा है। हालत यह है कि कोरोना के कम्युनिटी संक्रमण की आशंकाओं के बाद भी सरकारों की कुछ समय के लिए सबकुछ बंद करने की हिम्मत नहीं हो पा रही है।

यह साफ हो गया है कि 2020 पूरी तरह से कोरोना को भेंट चढ़ गया है, वहीं 2021 में भी हालात सामान्य हो जाएंगे, कहना मुश्किल है। अन्य कारणों को अलग भी कर दिया जाए तो दुनिया के देशों में अशांति का बड़ा कारण कोरोना और उसका दुष्प्रभाव होने वाला है। यह दुनिया के देशों के सामने अपने आप में गंभीर चेतावनी और चुनौती है। हालांकि कोरोना की छाया में ही अमेरिका में आम चुनाव होने जा रहे हैं और मास्क का उपयोग होना या नहीं होना व कोरोना से निपटने के प्रयास अमेरिका की दोनों ही पार्टियों के चुनाव प्रचार का मुख्य मुद्दा बनता जा रहा है।

विश्व शांति पहली आवश्यकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए यूएनओ ने दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया। अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक दिवस का आगाज 1982 से हुआ और पहले सितंबर माह के तीसरे सप्ताह के मंगलवार को इसका आयोजन किया जाता रहा। 2001 से तीसरे मंगलवार के स्थान पर अब 21 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय वैश्विक शांति दिवस का आयोजन किया जाने लगा है। अंतरराष्ट्रीय संघ के मुख्यालय में इस दिन शांति की प्रतीक घंटी बजाई जाती है तो सफेद कबूतर उड़ाकर शांति का संदेश दिया जाता है। इस साल की थीम का संदेश साफ है कि विश्व शांति के लिए समन्वित प्रयास किए जाएं।

दुनिया के देशों में शांति व्यवस्था को लेकर रैंकिंग भी की जाती है। इस रैंकिंग में जहां आइसलैण्ड शीर्ष पर है तो न्यूजीलैण्ड, पुर्तगाल, आस्ट्रिया और डेनमार्क पहले पांच देशों में शामिल हैं। भारत 139 वें नंबर पर है तो अमेरिका की स्थिति भी ज्यादा अच्छी नहीं मानी जा सकती। अमेरिका 121वें स्थान पर है। दुनिया के 163 देशों में अफगानिस्तान सबसे अंशात देश माना गया है। रैंकिंग के अनुसार 81 देशों में कुछ सुधार है तो 80 देशों की रैंकिंग में गिरावट देखी गई है।

विचारणीय यह है कि अशांति के चलते बहुत कुछ गंवाना पड़ता है। जो पैसा और समय विकास कार्यों व अन्य रचनात्मक गतिविधियों में लगना चाहिए वह समय और पैसा अशांति को नियंत्रण में करने में लग जाता है। आज आए दिन अमेरिका में कहीं ना कहीं यकायक चाकूबाजी या गोलीबारी के समाचार आने लगते हैं तो फ्रांस भी समस्याओं से जूझता रहा है। घरों में हथियारों का जखीरा एकत्रित हो रहा है तो हिंसात्मक हथियार चाकू, रिवॉल्वर आदि आम होते जा रहे हैं। आतंकवादी गतिविधियां हो रही हैं तो सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन और उनका भी हिंसात्मक रूप लेना गंभीर चिंता का विषय है। अमेरिका में अश्वेत नागरिक की पुलिस कार्यवाही के कारण मौत के बाद जिस तरह से उग्र प्रदर्शन हुए या फ्रांस में हिंसात्मक गतिविधियां देखने को मिली या आए दिन दुनिया के दूसरे देशों में हिंसात्मक गतिविधियां हो रही हैं, यह चिंता का विषय है।

हमारे देश में ही जिस तरह की घटनाएं दिल्ली में हुईं और जिस तरह कोरोना के बावजूद प्रदर्शन हो रहे हैं, वह चिंता का बड़ा कारण है। इन प्रदर्शनों के हिंसात्मक रूप लेते ही जिस तरह से सार्वजनिक व निजी संपत्ति का विनाश होता है और जिस तरह से पूरी मशीनरी को शांति के लिए जुटना पड़ता है वह विकास में बाधक ही बनती है।

कोरोना के साइड इफेक्ट में जिस तरह से बेरोजगारी बढ़ी है, आय के साधन सीमित हुए हैं, लोगों में निराशा और कुंठा फैली है, उद्योग-धंधे प्रभावित हुए, यह अशांति का बड़ा संकेत है। इन हालातों से निपटने के लिए अभी से सरकारों को लोगों को मानसिक रूप से तैयार करना होगा। लोगों की मानसिकता बदलनी होगी। यह नहीं भूलना चाहिए कि कोरोना के साइड इफेक्ट के रूप में यह बड़ा नकारात्मक प्रभाव आने वाला है जिससे निपटने की तैयारी दुनिया के देशों को अभी से करनी होगी। लोगों में सकारात्मकता बढ़ाने के साथ ही आशा का संचार करना होगा तभी जाकर दुनिया के देशों में शांति कायम हो सकेगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है।)

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