
डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मिडटर्म चुनाव में बड़ा झटका लगा है. पार्टी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अपना कंट्रोल खो बैठी है. इस हार का असर अब दुनियाभर के बाजारों पर दिखाई देने लगा है. अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध खत्म होने की उम्मीद बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में करीब 10% की गिरावट आई है. गुरुवार को ब्रेंट क्रूड का भाव 95 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया. इसका फायदा भारतीय शेयर बाजार में तेल पर निर्भर कंपनियों को मिला है. IndiGo, Asian Paints, Apollo Tyres और BPCL समेत कई कंपनियों के शेयरों में 8% तक की तेजी देखने को मिली.
दरअसल, कच्चा तेल सस्ता होने से उन कंपनियों की लागत कम हो जाती है, जिनके कारोबार में पेट्रोलियम उत्पादों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है. इनमें एयरलाइंस, पेंट और टायर बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं. इसके अलावा, तेल की कीमतों में गिरावट से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को भी राहत मिल सकती है.
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का सबसे ज्यादा फायदा एयरलाइन, पेंट और टायर कंपनियों के शेयरों को मिला. एयरलाइन कंपनी IndiGo के शेयर करीब 7% उछलकर 5,489 रुपये पर पहुंच गए. वहीं, SpiceJet के शेयरों में करीब 5% की तेजी आई. पेंट कंपनियों में Asian Paints के शेयर करीब 7% चढ़ गए. वहीं, Indigo Paints और Berger Paints के शेयरों में 5% तक की बढ़त देखने को मिली. टायर कंपनियों की बात करें तो Apollo Tyres और Balkrishna Industries के शेयर 8% से ज्यादा उछल गए. वहीं, MRF के शेयरों में 4% से ज्यादा की तेजी आई. इसके एक शेयर की कीमत करीब 1.23 लाख रुपये पहुंच गई. इसके अलावा, सरकारी तेल कंपनियों HPCL, BPCL और Indian Oil Corporation (IOC) के शेयरों में भी 7% तक की तेजी दर्ज की गई.
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के पीछे अमेरिका की राजनीति और ईरान के साथ जारी युद्ध को अहम वजह माना जा रहा है. अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स दोनों में हार का सामना करना पड़ा है. इस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी को बड़ी जीत मिली है. माना जा रहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध, महंगाई और आम लोगों की बढ़ती खर्च की परेशानी ने ट्रंप सरकार के खिलाफ माहौल बनाया. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि चुनावी नतीजों के बाद ट्रंप ईरान युद्ध को लेकर क्या कदम उठा सकते हैं. निवेशक अब युद्ध खत्म होने की संभावना को पहले से ज्यादा मान रहे हैं. इसी उम्मीद के चलते ब्रेंट क्रूड का भाव 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे और अमेरिकी WTI क्रूड 87 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया.
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत होने से युद्ध से जुड़े खर्चों को मंजूरी मिलने में मुश्किल हो सकती है. इससे युद्ध की स्थिति को काबू करने और होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली तेल सप्लाई से जुड़ी परेशानियां कम होने की उम्मीद है. अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 90-100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बनी रहती है, तो महंगाई को लेकर चिंताएं कम हो सकती हैं. यह भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार दोनों के लिए अच्छा संकेत होगा. आने वाले समय में कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों पर निर्भर कंपनियों और सेक्टर को भी फायदा मिल सकता है. इसके अलावा, रुपए में मजबूती आने की स्थिति में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) का भारतीय बाजार में निवेश बढ़ सकता है. इससे बड़ी और मझोली कंपनियों के शेयरों को सहारा मिलने की उम्मीद है.
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