
बीआरटीएस हटाने का भी नहीं मिला कोई लाभ
इंदौर, राजेश ज्वेल
बीते कुछ समय से इंदौर (Indore ) भीषण अराजकता (Chaos) का शिकार है। ऐसा लगता है किसी का कोई नियंत्रण ही नहीं है। नेता नगरी तो विभिन्न धार्मिक (Religious) और राजनीतिक (Political) आयोजनों में व्यस्त है, तो जनता यातायात जाम और भीषण जलसंकट से लेकर तमाम समस्याओं से त्रस्त है। बीते वर्षों में इंदौर की ऐसी दुर्गति नहीं देखी गई, जिसे शहर के आम आदमी से लेकर रसूखदारों तक महसूस किया जा रहा है। ऐसी ही एक अराजकता एबी रोड पर नजर आती है, जहां पर लोक निर्माण विभाग को एलिवेटेड कॉरिडोर एलआईजी से नवलखा तक बनाना है। मगर मौके पर बीते कई दिनों से निर्माण के कोई अते-पते नहीं हैं और दोनों तरफ पतरे ठोंककर अच्छी-भली चौड़ी सडक़ को संकरा कर डाला, जिससे बीआरटीएस हटाने का भी कोई फायदा नहीं मिला।
पहले तो शहर की जनता निरंजनपुर से लेकर राजीव गांधी प्रतिमा तक निर्मित साढ़े 11 किलोमीटर के बीआरटीएस कॉरिडोर के चलते हैरान-परेशान थी, जिसके कारण रोजाना ही जाम लगता था। मुख्यमंत्री के निर्देश और हाईकोर्ट आदेश के बाद जैसे-तेसे बीआरटीएस कॉरिडोर से तो मुक्ति मिली मगर उसके बाद दो निर्माणाधीन फ्लायओवर और फिर एलिवेटेड कॉरिडोर के चलते आधे से अधिक बीआरटीएस कॉरिडोर को आवागमन के लिए आधे से अधिक बंद कर डाला। निरंजनपुर, देवास नाका और सत्यसांई चौराहा पर एमपीआईडीसी द्वारा जो फ्लायओवर बनाए जा रहे हैं वे भी लेटलतीफी के शिकार हैं, जिसके कारण इन हिस्सों में भी छोटी-सी सर्विस रोड से भारी-भरकम यातायात गुजर रहा है। इसके बाद लोक निर्माण विभाग को अचानक सुझा कि 2019 में जो उसने एलिवेटेड कॉरिडोर का ठेका दिया था, उसका काम शुरू करवाया जाए। मुख्यमंत्री सहमति दे चुके थे। लिहाजा रातों रात लोक निर्माण विभाग ने एलआईजी चौराहा के पहले से पलासिया के बीच पतरे ठोंक डाले। बाद में मिट्टी परीक्षण के साथ तीन-चार जगह पाइल का काम भी थोड़े दिन चला और कुछ मशीनें-मजदूर भी आए, लेकिन उसके बाद बीते कई दिनों से किसी तरह की कोई हलचल इस एलिवेटेड कॉरिडोर निर्माण की मौके पर नजर नहीं आती। यानी पूरी तरह से कॉरिडोर का निर्माण कार्य ठप पड़ा है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसके लिए जीएडी यानी जनरल अरेंजमेंट ड्राइंग के ही अते-पते नहीं हैं और विभाग इसकी मंजूरी प्रक्रिया में जुटा है। जानकारों का कहना है कि बिना जीएडी एप्रूव्हल के ये एलिवेटेड कॉरिडोर बन ही नहीं सकता और वैसे भी जो पुराना ठेका दिया गया था उसमें वर्तमान में आमूलचुल परिवर्तन हो चुका है। ऐसे में एस्केलेशन से लेकर कई ड्राइंग-डिजाइन के अलावा वर्तमान ठेकेदार की क्षतिपूर्ति कैसे होगी, यह भी सबसे बड़ा सवाल है। दूसरी तरफ पीडब्ल्यूडी वैसे भी अपने ब्रिजों की ऊटपटांग डिजाइन को लेकर देशभर में सुर्खियां बटोर चुका है।
हाईकोर्ट में भी विभाग अभी तक स्पष्ट जवाब नहीं दे पाया है
एबी रोड के इस एलिवेटेड कॉरिडोर को हाईकोर्ट में अतुल सेठ ने जनहित याचिका के जरिए इसे चुनौती भी दे रखी है और पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने भी पूछा था कि बिना स्पष्ट सर्वे या तकनीकी जानकारी के अभाव इसका निर्माण कैसे हो रहा है। सेठ का कहना है शासन ने जो जवाब दिया, मैंने उसका भी प्रति उत्तर प्रस्तुत कर दिया है और सुगम यातायात के लिए एलिवेटेड की बजाय अन्य विकल्प बताए गए हैं, जिसमें प्रमुख चौराहों पर फ्लायओवर का निर्माण करना भी शामिल है। हालांकि दूसरा पक्ष एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण को बेहतर बताता है। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि भले ही एलिवेटेड कॉरिडोर बने, मगर कम से कम लोक निर्माण विभाग यह तो स्पष्ट करे कि उसकी ड्राइंग-डिजाइन अंतिम रूप से क्या तय की गई और वर्तमान में जीएडी यानी जनरल अरेंजमेंट डिजाइन का क्या स्टेटस है और मौके पर कब से विधिवत काम शुरू होकर खत्म होगा। क्योंकि बीते कई दिनों से इस एलिवेटेड को लेकर कोई भी मैदानी हलचल नहीं है। दोनों तरफ पतरे लगाकर जो बीच का रास्ता बंद किया है उसमें पूरी तरह से सन्नाटा पसरा है। कम से कम कलेक्टर शिवम वर्मा को यह बाधा दूर करवाना चाहिए। फिलहाल दोनों तरफ लगे पतरे हटवाएं जाएं।
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