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इंदौर: सिस्टम खुद कर रहा वाहन ट्रांसफर, अधिकारी की जांच खत्म, परिवहन अधिकारियों ने बताया खतरनाक

October 01, 2026

केंद्र सरकार के वाहन पोर्टल पर पिछले दिनों लागू हुए ऑटो अप्रूवल के बाद बिना परिवहन अधिकारी की जांच के 5 मिनट में हो रहा वाहन ट्रांसफर, निकल रही एनओसी

इंदौर। वाहन (vehicle) की खरीद-बिक्री (buy Sell) के बाद अब आरटीओ (RTO) में दस्तावेजों की जांच और अधिकारी की मंजूरी के बजाय ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेज अपलोड और ओटीपी के आधार पर वाहन ट्रांसफर की नई व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वाहन पोर्टल पर शुरू किए गए फेसलेस ऑटो-अप्रूवल सिस्टम पर इंदौर आरटीओ प्रदीप शर्मा सहित अन्य परिवहन अधिकारियों ने परिवहन आयुक्त को विस्तृत आपत्ति भेजी है। इसमें सिस्टम की कानूनी और तकनीकी कमियां बताते हुए व्यवस्था में बदलाव की मांग की गई है। आरटीओ का कहना है कि सॉफ्टवेयर कई महत्वपूर्ण जांच करने में सक्षम नहीं है, जो अब तक अधिकारी स्तर पर की जाती थी।

टैक्स-पेनल्टी से लेकर दस्तखत तक की जांच नहीं
अधिकारी के स्तर पर वाहन ट्रांसफर से पहले यह देखा जाता है कि वाहन पर टैक्स या पेनल्टी बकाया तो नहीं है, बीमा और फिटनेस की स्थिति क्या है, किसी फाइनेंसर का हक तो नहीं है और फॉर्म पर किए गए दस्तखत वास्तविक हैं या नहीं। ऑटो-अप्रूवल में इनमें से कई महत्वपूर्ण जांच नहीं होती। आरटीओ की आपत्ति में फाइनेंसर की एनओसी, हाइपोथिकेशन खत्म करने के लिए फॉर्म-35, परमिट वाले वाहनों का ट्रांसफर, फिटनेस प्रमाणपत्र, बीमा, मृत वाहन मालिक के नाम पर ट्रांसफर, नीलामी से खरीदे वाहन, चेसिस-इंजन नंबर, स्क्रैप वाहन और टैक्स बकाया जैसे मामलों में जोखिम गिनाए गए हैं।


  • गलत दस्तावेज या खाली पन्ना भी बन सकता है आधार
    आरटीओ ने सबसे बड़ी तकनीकी कमी अपलोड किए गए दस्तावेजों की वास्तविक जांच नहीं होने को बताया है। आवेदन में पीडीएफ दस्तावेज अपलोड किए जाते हैं, लेकिन सिस्टम उनकी सामग्री को पढ़कर वास्तविकता की पुष्टि नहीं करता। ऐसे में गलत या अधूरे दस्तावेज, यहां तक कि किसी दस्तावेज के स्थान पर खाली पन्ना अपलोड होने पर भी ऑटो-अप्रूवल की स्थिति बन रही है। अपलोड किए गए दस्तावेजों का बीमा कंपनी, पीयूसी सेंटर, फाइनेंसर या संबंधित आरटीओ के मूल रिकॉर्ड से एपीआई के जरिए क्रॉस-वेरिफिकेशन भी नहीं हो रहा है। इसलिए आरटीओ ने व्यवस्था के साथ एआई आधारित डॉक्यूमेंट रीडर और वेरिफिकेशन सिस्टम जोड़ने का सुझाव दिया है।

    सिर्फ ओटीपी से मालिक की सहमति मानना भी जोखिम भरा
    नोट में कहा गया है कि आधार या ओटीपी से व्यक्ति की पहचान हो सकती है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि वही व्यक्ति वाहन का वास्तविक मालिक है और उसे वाहन बेचने का अधिकार भी है। वाहन रिकॉर्ड में दर्ज मोबाइल नंबर पुराना हो सकता है, डीलर या एजेंट का हो सकता है या बाद में किसी दूसरे व्यक्ति को जारी हो चुका हो सकता है। फॉर्म 29 और 30 पर किए गए हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान की भी वास्तविक जांच नहीं होती, साथ ही विक्रेता के लिए ऐसी प्रभावी कन्फर्मेशन विंडो नहीं है, जिसमें वह ट्रांसफर पूरा होने से पहले आपत्ति दर्ज कर सके।

    चोरी और क्लोन वाहन को भी मिल सकती है नई पहचान
    आरटीओ ने चेताया है कि चेसिस और इंजन नंबर की भौतिक जांच नहीं होने पर छेड़छाड़ किए गए या क्लोन वाहन भी कागजों में वैध तरीके से ट्रांसफर हो सकते हैं। चोरी के वाहनों को अलग-अलग जिलों और राज्यों में तेजी से ट्रांसफर कर उनकी पुरानी पहचान और ट्रेल खत्म करने का जोखिम भी बताया गया है।

    साइबर फ्रॉड का खतरा भी बढ़ने की आशंका
    आपत्ति में वाहन पोर्टल से जुड़े देश के अलग-अलग मामलों का उल्लेख किया गया है। हिमाचल प्रदेश के सोलन में जनवरी 2026 के एक मामले में वाहन पोर्टल के रिकॉर्ड में अनधिकृत बदलाव, हाइपोथिकेशन हटाने और स्वामित्व में बदलाव जैसी गड़बड़ियों का उल्लेख है। दिल्ली से जुड़े एक मामले में भी वाहन पोर्टल के ओटीपी तक पहुंच बनाकर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर चोरी के वाहनों के पंजीयन का उल्लेख किया गया है। आरटीओ ने सिम-स्वैप, पुराने या रिसाइकल मोबाइल नंबर, मालवेयर के जरिए ओटीपी हासिल करने, मृत व्यक्ति के आधार-मोबाइल का दुरुपयोग, फर्जी हाइपोथिकेशन खत्म कर तत्काल वाहन बेचने और दुर्घटना के बाद पीछे की तारीख में ट्रांसफर करने जैसे संभावित दुरुपयोग भी गिनाए हैं।

    दुर्घटना में असली मालिक और पीड़ित दोनों के लिए परेशानी
    वाहन का रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड दुर्घटना, ई-चालान, हिट एंड रन और बीमा दावों में महत्वपूर्ण होता है। रिकॉर्ड गलत व्यक्ति के नाम होने पर दुर्घटना के बाद तीसरे पक्ष की क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी गलत व्यक्ति पर आ सकती है। दूसरी ओर वास्तविक मालिक रिकॉर्ड से बाहर हो जाए तो दुर्घटना पीड़ित के लिए मुआवजा वसूलना भी मुश्किल हो सकता है। फिटनेस, पीयूसी, बीमा और ओवरलोडिंग जैसी स्थितियों की जांच नहीं होने पर ऐसे वाहन भी साफ रिकॉर्ड के साथ सड़क पर चलते रह सकते हैं, जिन पर कार्रवाई जरूरी है।

    फैसला सिस्टम लेगा, लेकिन जवाबदेही अधिकारी की
    आरटीओ ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक गड़बड़ी की संभावना को भी उठाया है। ऑटो-अप्रूवल में निर्णय सिस्टम लेता है, लेकिन रिकॉर्ड में अनुमोदन अधिकारी के नाम से दिखाई दे सकता है। भविष्य में आपराधिक, विजिलेंस या अन्य जांच में अधिकारी से उस निर्णय की जवाबदेही मांगी जा सकती है, जबकि निर्णय लेते समय उसकी कोई भूमिका नहीं थी। इसी तरह कई मामलों में कोर्ट में भी अधिकारी को उपस्थित होना पड़ता है, लेकिन यहां सभी निर्णय सिस्टम ले रहा है। ऐसे में अधिकारी की जवाबदेही कैसे तय की जा सकती है।

    ऑटोमेशन अच्छा है, लेकिन सुरक्षा उपायों के साथ
    नागरिक सेवाओं को तेज और आसान बनाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए वैधानिक सत्यापन पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। इसलिए सभी जरूरी सुरक्षा उपाय लागू होने तक ऑटो-अप्रूवल व्यवस्था को स्थगित रखने की मांग की गई है। ऐसा ना होने से फर्जी तरीके से वाहनों के ट्रांसफर जैसी घटनाएं बढ़ेंगी। टैक्स वसूली भी प्रभावित होगी। तमिलनाडु और केरल ने भी इस व्यवस्था को अस्वीकार किया है। मध्यप्रदेश के भी सभी परिवहन अधिकारी चाहते हैं कि जरूरी बदलाव तक मध्यप्रदेश में भी इसे लागू ना किया जाए।
    – प्रदीप शर्मा, आरटीओ, इंदौर

    आरटीओ ने दिए ये सुझाव
    – सभी वाहनों को ऑटो-अप्रूवल देने के बजाय कम जोखिम वाले मामलों तक इसे सीमित किया जाए।
    – ट्रांसफर से पहले कम से कम 7 दिन की कूलिंग-ऑफ अवधि रखी जाए, ताकि विक्रेता और फाइनेंसर को सूचना देकर आपत्ति का मौका मिले।
    – ओटीपी के साथ फेस ऑथेंटिकेशन, डिवाइस और आईपी बाइंडिंग और जियो-फेंसिंग जैसी अतिरिक्त सुरक्षा जोड़ी जाए।
    – चोरी के वाहन, ई-चालान, टैक्स बकाया, कोर्ट अटैचमेंट, फाइनेंसर एनओसी, बीमा और परमिट की रियल-टाइम जांच हो।
    – जोखिम वाले मामलों में सिस्टम ऑटो-अप्रूव करने के बजाय आवेदन रोक दे।
    – आरटीओ अधिकारी के डिजिटल सिग्नेचर और मेकर-चेकर व्यवस्था के साथ संवेदनशील मामलों की मंजूरी हो।
    – हाई-वैल्यू, कमर्शियल और हाइपोथिकेटेड वाहनों के मामलों का 100 प्रतिशत पोस्ट-ऑडिट किया जाए।
    – फर्जी ट्रांसफर को रद्द करने और रिकॉर्ड को पुरानी स्थिति में वापस लाने की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।
    – सिस्टम से होने वाले फ्रॉड में केंद्र, एनआईसी और राज्य की जवाबदेही स्पष्ट की जाए।

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