
नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) सोमनाथ मंदिर के 75 वर्ष पूरे होने के विशेष समारोह (Special function to mark 75th anniversary of Somnath Temple) में 11 मई को शामिल होंगे (Will attend on May 11) ।
आस्था, साहस और भारतीय सभ्यता की अमर पहचान माने जाने वाले सोमनाथ मंदिर का इतिहास एक बार फिर चर्चा में है। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के जरिए इस वर्ष मंदिर पर हुए पहले हमले के 1,000 साल और इसके पुनर्निर्माण के बाद दोबारा उद्घाटन के 75 वर्ष पूरे होने का विशेष आयोजन किया जा रहा है। गुजरात के सौराष्ट्र तट पर प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला और सबसे पवित्र माना जाता है। शिव पुराण में वर्णित यह मंदिर भगवान शिव, भगवान कृष्ण और शक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में भी सोमनाथ को सबसे पहला स्थान दिया गया है, जो भारतीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत में इसकी सर्वोच्च पहचान को दर्शाता है।
सोमनाथ मंदिर का इतिहास संघर्ष और पुनर्निर्माण की अद्भुत गाथा है। वर्ष 1026 में इस मंदिर पर पहला बड़ा हमला हुआ था। इसके बाद 11वीं से 18वीं शताब्दी तक कई बार मंदिर को तोड़ा गया और लूटा गया, लेकिन हर बार भक्तों और राजाओं ने इसे फिर से खड़ा किया। 12वीं शताब्दी में राजा कुमारपाल ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। इसके बाद जूनागढ़ के राजा और फिर इंदौर की मराठा महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने भी सोमनाथ मंदिर को नई पहचान दी।
स्वतंत्रता के बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1947 में सोमनाथ के खंडहरों का दौरा किया और इसके पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। उनका मानना था कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास को फिर से मजबूत करेगा। इसके बाद जनभागीदारी और राष्ट्रीय संकल्प के साथ वर्तमान मंदिर का निर्माण कैलाश महामेरु प्रसाद वास्तुशैली में किया गया। 11 मई 1951 को भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का पुनः उद्घाटन किया। आज, 75 साल बाद भी सोमनाथ भारत की आस्था, गौरव और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक बना हुआ है।
सोमनाथ की कहानी केवल मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि उन वीरों की भी है जिन्होंने इसकी रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इनमें वीर हमिरजी गोहिल का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। माना जाता है कि 1299 में जफर खान के हमले के दौरान उन्होंने मंदिर की रक्षा करते हुए बलिदान दिया था। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ भारत की उसी अटूट आस्था और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उत्सव है। यह आयोजन एक तरफ 1026 में हुए पहले हमले की याद दिलाता है, तो दूसरी तरफ 1951 में मंदिर के पुनः उद्घाटन के जरिए भारत के सांस्कृतिक पुनर्जन्म का संदेश देता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं, ने मंदिर को भारत की ‘अजेय आत्मा’ का प्रतीक बताया है। उन्होंने ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र के साथ सोमनाथ में अगले 1,000 दिनों तक विशेष पूजा आयोजित करने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री ने लोगों से इस ऐतिहासिक काल में सोमनाथ आने की अपील भी की है। जनवरी 2026 में भी प्रधानमंत्री मोदी ने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में हिस्सा लिया था। इस दौरान 72 घंटे तक ओंकार मंत्र का जाप हुआ और राष्ट्र की समृद्धि के लिए विशेष पूजा-अर्चना की गई। प्रभास पाटन में 108 घोड़ों के साथ भव्य शौर्य यात्रा भी निकाली गई, जो मंदिर की रक्षा करने वाले योद्धाओं को समर्पित थी।
दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन से 30 अप्रैल 2026 को ‘चलो चलें सोमनाथ’ अभियान के तहत विशेष ट्रेन रवाना की गई थी। इस यात्रा में 1300 से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए। 1 मई को यात्रा सोमनाथ पहुंची, जहां आरती, सांस्कृतिक कार्यक्रम और लाइट एंड साउंड शो का आयोजन किया गया। अरब सागर के किनारे स्थित यह भव्य मंदिर 150 फीट ऊंचे शिखर से सुसज्जित है, जिसके ऊपर 10 टन का कलश स्थापित है। मंदिर परिसर में 1666 स्वर्ण कलश और 14,200 ध्वज इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं। हर साल यहां 92 से 97 लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
सोमनाथ ट्रस्ट केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ी भूमिका निभा रहा है। ट्रस्ट ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए कंप्यूटर शिक्षा, सिलाई, डिजिटल साक्षरता और रोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहा है। ‘स्कूल ऑन व्हील्स’ जैसी पहल गांवों तक डिजिटल शिक्षा पहुंचा रही है। कोविड-19 महामारी के दौरान ट्रस्ट ने पहली लहर में 8.73 करोड़ रुपए और दूसरी लहर में 2.21 करोड़ रुपए की सहायता दी। इसके अलावा मुख्यमंत्री राहत कोष में 1 करोड़ रुपये का योगदान भी दिया गया। ऑक्सीजन प्लांट, मेडिकल सहायता और जरूरतमंद परिवारों तक राशन पहुंचाने का काम भी किया गया।
सोमनाथ को 2018 में ‘स्वच्छ आइकॉनिक प्लेस’ घोषित किया गया था। यहां मंदिर के फूलों से वर्मी कम्पोस्ट बनाई जाती है, प्लास्टिक कचरे से पावर ब्लॉक तैयार किए जाते हैं और हर महीने लगभग 30 लाख लीटर पानी को रीसायकल किया जाता है। 7200 पेड़ों वाला मियावाकी जंगल हर साल करीब 93 हजार किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है। महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में भी सोमनाथ एक मिसाल बन चुका है। मंदिर ट्रस्ट के 906 कर्मचारियों में 262 महिलाएं हैं। बिल्व वन से लेकर प्रसाद वितरण और भोजन सेवा तक में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। कुल 363 महिलाओं को सीधे रोजगार मिला है, जिनकी सालाना आय लगभग 9 करोड़ रुपये है।
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